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भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय २०

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय  २०  

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय २० - फल-द्वितीया (अशून्यशयन-व्रत) का व्रत-विधान और द्वितीया-कल्प की समाप्ति का वर्णन है ।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय  २०

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय २०     

Bhavishya puran Brahma parva chapter 20

भविष्यपुराणम् पर्व ब्राह्मपर्व अध्यायः २०     

भविष्यपुराणम् पर्व १ (ब्राह्मपर्व) अध्यायः २०     

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व बीसवाँ अध्याय

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय २० भावार्थ सहित

राजा शतानीक ने कहा मुने ! कृपाकर आप फल-द्वितीया का विधान कहें, जिसके करने से स्त्री विधवा नहीं होती और पति-पत्नी का परस्पर वियोग भी नहीं होता ।

सुमन्तु मुनि ने कहा राजन ! मैं फल-द्वितीया का विधान कहता हूँ, इसीका नाम अशून्यशयना-द्वितीया भी हैं । इस व्रत को विधिपूर्वक करने से स्त्री विधवा नहीं होती और स्त्री-पुरुष का परस्पर वियोग भी नहीं होता । क्षीरसागर में लक्ष्मी के साथ भगवान् विष्णु के शयन करने के समय यह व्रत होता है । श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया के दिन लक्ष्मी के साथ श्रीवत्सधारी भगवान् श्रीविष्णु का पूजन कर हाथ जोडकर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये

श्रीवत्सधारिन् श्रीकान्त श्रीवत्स श्रीपतेऽव्यय ।

गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं में यातु धर्मार्थकामदम् ॥

गावश्च मा प्रणश्यन्तु मा प्रणश्यन्तु में जनाः ॥

जामयो मा प्रणश्यन्तु मत्तो दाम्पत्यभेदतः ।

लक्ष्म्या वियुज्येऽहं देव न कदाचिद्यथा भवान् ॥

तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे वियुज्यताम् ।

लक्ष्म्या न शून्यं वरद यथा ते शयनं सदा ॥

शय्या ममाप्यशुन्यास्तु तथा तू मधुसुदन ।

अर्थात् हे श्रीवत्स चिह्न को धारण करने वामे लक्ष्मी के स्वामी शाश्वत भगवान् विष्णु ! धर्म, अर्थ और काम को पूर्ण करने करने वाला मेरा गृहस्थ आश्रम कभी नष्ट न हो । मेरी गौएँ भी नष्ट न हों न कभी मेरे परिवार के लोग कष्ट में पड़ें एवं न नष्ट हों । मेरे घर की स्त्रियाँ भी कभी विपत्तियों में न पड़ें और हम पति-पत्नी में भी कभी मतभेद न हो । हे देव ! मैं लक्ष्मी से कभी वियुक्त न होऊँ और पत्नी से भी कभी मुझे वियोग की प्राप्ति न हो । प्रभो ! जैसे आपकी शय्या कभी लक्ष्मी से शून्य नहीं होती, उसी प्रकार मेरी शय्या भी कभी शोभारहित एवं लक्ष्मी तथा पत्नी से शून्य न हो ।

इस प्रकार विष्णु की प्रार्थना करके व्रत करना चाहिये । जो फल भगवान् को प्रिय हैं, उन्हें भगवान की शय्या पर समर्पित करना चाहिये और स्वयं भी रात्रि के समय उन्हीं फलों को खाकर दुसरे दिन ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिये ।

राजा शतानीक ने पूछा महामुने ! भगवान विष्णु को कौन-से फल प्रिय हैं, आप उन्हें बतायें । दुसरे दिन ब्राह्मणों को क्या दान देना चाहिये ? उसे भी कहें ।

सुमन्तु मुनि बोले राजन् ! उस ऋतु में जो भी फल हों और पके हों, उन्हींको भगवान् विष्णु के लिये समर्पित करना चाहिये । कड़ुवे-कच्चे तथा खट्टे फल उनकी सेवामें नही चढाने चाहिये । भगवान विष्णु को खजूर, नारिकेल, मातुलुङ्ग अर्थात् बिजौरा आदि मधुर फलों को समर्पित करना चाहिये । भगवान् मधुर फलों से प्रसन्न होते हैं । दुसरे दिन ब्राह्मणों को भी इसी प्रकार के मधुर फल, वस्त्र, अन्न तथा सुवर्ण का दान देना चाहिये ।

इस प्रकार जो पुरुष चार मास तक व्रत करता है, उसका तीन जन्मों तक गार्हस्थ्य जीवन नष्ट नही होता और न तो ऐश्वर्य की कमी होती है । जो स्त्री इस व्रत को करती है वह तीन जन्मों तक न विधवा होती है न दुर्भगा और न पति से पृथक् ही रहती है । इस व्रत के दिन अश्विनीकुमारों की भी पूजा करनी चाहिये । राजन् ! इसप्रकार मैंने द्वितीया-कल्प का वर्णन किया है ।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय २० सम्पूर्ण।   

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भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १९

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय  १९  

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १९ - द्वितीया कल्प मे महर्षि च्यवन की कथा एवं पुष्पद्वितीया व्रत की महिमा का वर्णन है ।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय  १९

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १९     

Bhavishya puran Brahma parva chapter 19

भविष्यपुराणम् पर्व ब्राह्मपर्व अध्यायः १९     

भविष्यपुराणम् पर्व १ (ब्राह्मपर्व) अध्यायः १९     

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व उन्नीसवाँ अध्याय

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १९ भावार्थ सहित

सुमन्तु मुनि बोले द्वितीया तिथि को च्यवन ऋषि ने इन्द्र के सम्मुख यज्ञ में अश्विनी-कुमारों को सोमपान कराया था।

राजा ने पूछा महाराज ! इन्द्र के सम्मुख किस विधि से अश्विनी-कुमारों को उन्होंने सोमरस पिलाया ? क्या च्यवन-ऋषि की तपस्या के प्रभाव की प्रबलता से इन्द्र कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं हुए? सुमन्तु मुनि ने कहासत्ययुगकी पूर्व-संध्या में गंगा के तट पर समाधिस्थ हो च्यवन-मुनि बहुत दिनों से तपस्या में रत थे। एक समय अपनी सेना और अन्तःपुर के परिजनों को साथ लेकर महाराज शर्याति गंगा-स्नान के लिये वहाँ आये। उन्होंने च्यवन-ऋषि के आश्रम के* समीप आकर गंगा स्नान सम्पन्न किया तथा देवताओं की आराधना की और पितरों का तर्पण किया। तदनन्तर जब वे अपने नगर की ओर जाने को उद्यत हुए तो उसी समय उनकी सभी सेनाएँ व्याकुल हो गयीं और मूत्र तथा विष्ठा उनके अचानक ही बंद हो गये ऑखों से कुछ भी नहीं दिखायी दिया। सेना की यह दशा देखकर राजा घबड़ा उठे। राजा शर्याति प्रत्येक व्यक्ति से पूछने लगेयह तपस्वी च्यवन-मुनि का पवित्र आश्रम है, किसी ने कुछ अपराध तो नहीं किया? उनके इस प्रकार पूछने पर किसी ने कुछ भी नहीं कहा।

* अन्य पुराणों में तथा महाभारतके अनुसार यह आश्रम सोनभद्र और वधूसरा नदीके संगमपर था, जो आज देवकुण्डके नामसे प्रसिद्ध है। प्राय: पुराणों में यह श्लोक भी प्राप्त होता है- मगधे तु गया पुण्या नदी पुण्या पुनपुना। व्यवनस्य आश्रम पुण्य पुण्यं राजगृहं वनम् ॥ तथा वधूसरेति सरिता च्यवनस्याश्रमं प्रति।

सुकन्या ने अपने पिता से कहामहाराज ! मैंने एक आश्चर्य देखा जिसका मैं वर्णन कर रही हूँ। अपनी सहेलियों के साथ मैं वन विहार कर रही थी कि एक ओरसे मुझे यह शब्द सुनायी पड़—’सुकन्ये ! तुम इधर आओ, तुम इधर आओ।यह सुनकर मैं अपनी सखियों के साथ उस शब्द की ओर गयी। वहाँ जाकर मैंने एक बहुत ऊँचा वल्मीक देखा। उसके अंदर के छिद्रों में दीपक के समान देदीप्यमान दो पदार्थ मुझे दिखलायी पड़े। उन्हें देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये पद्मरागमणि के समान क्या चमक रहे हैं। मैंने अपनी मूर्खता और चंचलता से कुशा के अग्रभाग से वल्मीक के प्रकाशयुक्त छिद्रों को बींध दिया। जिससे वह तेज शान्त हो गया।

यह सुनकर राजा बहुत व्याकुल हो गये और अपनी कन्या सुकन्या को लेकर वहाँ गये जहाँ च्यवन-मुनि तपस्या में रत थे। च्यवन-ऋषि को वहाँ समाधिस्थ होकर बैठे हुए इतने दिन व्यतीत हो गये थे कि उनके ऊपर वल्मीक बन गया था। जिन तेजस्वी छिद्रों को सुकन्या ने कुश के अग्रभाग से बींध दिया था, वे उस महातपस्वी के प्रकाशमान नेत्र थे। राजा वहाँ पहुँचकर अतिशय दीनता के साथ विनती करने लगे।

राजा बोलेमहाराज! मेरी कन्या से बहुत बड़ा अपराध हो गया है। कृपाकर क्षमा करें।

च्यवन-मुनि ने कहाअपराध तो मैंने क्षमा किया, परंतु अपनी कन्या का मेरे साथ विवाह कर दो, इसी में तुम्हारा कल्याण है। मुनि का वचन सुनकर राजा ने शीघ्र ही सुकन्या का च्यवन ऋषि से विवाह कर दिया। सभी सेनाएँ सुखी हो गयीं और मुनि को प्रसन्नकर सुखपूर्वक राजा अपने नगर में आकर राज्य करने लगे। सुकन्या भी विवाह के बाद भक्तिपूर्वक मुनि की सेवा करने लगी। राजवस्त्र, आभूषण उसने उतार दिये और वृक्षकी छाल तथा मृगचर्म धारण कर लिया। इस प्रकार मुनि की सेवा करते हुए कुछ समय व्यतीत हो गया और वसन्त-ऋतु आयी। किसी दिन मुनि ने संतान प्राति के लिये अपनी पत्नी सुकन्याका आह्वान किया। इसपर सुकन्या ने अतिशय विनय भाव से विनती की।

सुकन्या बोली  महाराज! आपकी आज्ञा मैं किसी प्रकार भी टाल नहीं सकती, किंतु इसके लिये आपको युवावस्था तथा सुन्दर वस्त्र-आभूषणों से अलंकृत कमनीय स्वरूप धारण करना चाहिये।

च्यवनमुनि ने उदास होकर कहान मेरा उत्तम रूप है और न तुम्हारे पिता के समान मेरे पास धन है, जिससे सभी भोग-सामग्रियों को में एकत्र कर सकूँ।

सुकन्या बोलीमहाराज! आप अपने तप के प्रभाव से सब कुछ करने में समर्थ हैं। आपके लिये यह कौन-सी बड़ी बात है ?

च्यवनमुनि ने कहा राजपुत्रि !  इस कामके लिये मैं अपनी तपस्या व्यर्थ नहीं करुंगा। इतना कहकर वे पहले की तरह तपस्या करने लगे। सुकन्या उनकी सेवायें तत्पर हो गयी।

इस प्रकार बहुत काल व्यतीत होने के बाद अश्विनीकुमार उसी मार्गसे चले जा रहे थे कि उनकी दृष्टि सुकन्या पर पड़ी।

अश्विनीकुमारों ने कहा भले ! तुम कौन हो ? और इस घोर वन में अकेली क्यों रहती हो ?

सुकन्याने कहामैं राजा शर्यातिकी सुकन्या नाम की पुत्री हूँ। मेरे पति च्यवनऋषि यहाँ तपस्या कर रहे हैं, उन्हींकी सेवाके लिये मैं यहाँ उनके समीप रहती हूँ। कहिये आप लोग कौन हैं?

अश्विनीकुमारों ने कहाहम देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमार हैं। इस वृद्ध पति से तुम्हें क्या सुख मिलेगा? हम दोनों में किसी एक का वरण कर लो।

सुकन्या ने कहादेवताओ! आपका ऐसा कहना ठीक नहीं। मैं पतिव्रता हूँ और सब प्रकार से अनुरक्त होकर दिन-रात अपने पति की सेवा करती हूँ।

अश्विनीकुमारों ने कहायदि ऐसी बात है तो हम तुम्हारे पतिदेव को अपने उपचारके द्वारा अपने समान स्वस्थ एवं सुन्दर बना देंगे और जब हम तीनों गंगा में स्नानकर बाहर निकलें फिर जिसे तुम पतिरूपमें वरण करना चाहो कर लेना।

सुकन्या ने कहामैं बिना पतिकी आज्ञा के कुछ नहीं कह सकती।

अश्विनीकुमारों ने कहातुम अपने पति से पूछ आओ, तब तक हम यहीं प्रतीक्षा में रहेंगे। सुकन्या ने च्यवनमुनि के पास जाकर उन्हें सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया। अश्विनीकुमारों की बात स्वीकार कर च्यवनमुनि सुकन्या को लेकर उनके पास आये।

च्यवनमुनि ने कहाअश्विनीकुमारो ! आपकी शर्त हमें स्वीकार है। आप हमें उत्तम रूपवान् बना दें, फिर सुकन्या चाहे जिसे वरण करे। च्यवनमुनि के इतना कहनेपर अश्विनीकुमार च्यवनमुनि को लेकर गंगाजी के जल में प्रविष्ट हो गये और कुछ देर बाद तीनों ही बाहर निकले सुकन्या ने देखा कि ये तीनों तो समान रूप समान अवस्था तथा समान वस्त्राभूषणों से अलंकृत हैं, फिर इनमें मेरे पति च्यवनमुनि कौन हैं? वह कुछ निश्चित न कर सकी और व्याकुल हो अश्विनीकुमारों की प्रार्थना करने लगी।

सुकन्या बोलीदेव ! अत्यन्त कुरूप पतिदेव का भी मैंने परित्याग नहीं किया था। अब तो आपकी कृपासे उनका रूप आपके समान सुन्दर हो गया है, फिर मैं कैसे उनका परित्याग कर सकती हूँ। मैं आपकी शरण , मुझपर कृपा कीजिये।

सुकन्या की इस प्रार्थना से अश्विनीकुमार प्रसन्न हो गये और उन्होंने देवताओं के चिह्नों को धारण कर लिया। सुकन्याने देखा कि तीन पुरुषों में से दो की पलकें गिर नहीं रही हैं और उनके चरण भूमिको स्पर्श नहीं कर रहे हैं, किंतु जो तीसरा पुरुष है, वह भूमि पर खड़ा है और उसकी पलकें भी गिर रही हैं। इन चिह्नोंको देखकर सुकन्याने निश्चित कर लिया कि ये तीसरे पुरुष ही मेरे स्वामी च्यवनमुनि हैं । तब उसने उनका वरण कर लिया। उसी समय आकाशसे उसपर पुष्प वृष्टि होने लगी और देवगण दुन्दुभि बजाने लगे।

च्यवनमुनि ने अश्विनीकुमारों से कहादेवो ! आप लोगों ने मुझपर बहुत उपकार किया है, जिसके फलस्वरूप मुझे उत्तम रूप और उत्तम पत्नी प्राप्त हुई। अब मैं आप लोगों का क्या प्रत्युपकार करूँ, क्योंकि जो उपकार करनेवाले का प्रत्युपकार नहीं करता, वह क्रम से इक्कीस नरकों में जाता है

उपकार वरिष्ठं या न करोत्युपकारिणः ॥

एकत्रिशत् स गच्छेच्च नरकाणि क्रमण वै।

इसलिये आपका मैं क्या प्रिय करुँ, आप लोग कहें।

अश्विनीकुमारों ने उनसे कहा -महात्मन् ! यदि आप हमारा प्रिय करना ही चाहते हैं तो अन्य देवताओं की तरह हमें भी यज्ञभाग दिलवाइये। च्यवनमुनि ने यह बात स्वीकार कर ली, फिर वे उन्हें विदाकर अपनी भार्या सुकन्या के साथ अपने आश्रममें आ गये।

राजा शर्यातिको जब यह सारा वृत्तान्त ज्ञात हुआ तो वे भी रानी को साथ लेकर सुन्दर रूप प्राप्त महा-तेजस्वी च्यवन-ऋषिको देखने आश्रम में आये। राजा ने च्यवनमुनि को प्रणाम किया और उन्होंने भी राजा का स्वागत किया। सुकन्या ने अपनी माता का आलिंगन किया। राजा शर्याति अपने जामाता महामुनि च्यवन का उत्तम रूप देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।

च्यवनमुनि ने राजा से कहाराजन् ! एक महायज्ञ की सामग्री एकत्र कीजिये हम आपसे यज्ञ करायेंगे। च्यवनमुनि की आज्ञा प्राप्त कर राजा शर्याति अपनी राजधानी लौट आये और यज्ञ सामग्री एकत्र कर यज्ञ की तैयारी करने लगे । मन्त्री, पुरोहित और आचार्य को बुलाकर यज्ञकार्य के लिये उन्हें नियुक्त किया। च्यवनमुनि भी अपनी पत्नी सुकन्या को लेकर यज्ञ-स्थल में पधारे।

सभी ऋषिगणों को आमन्त्रण देकर यज्ञ में बुलाया गया। विधिपूर्वक यज्ञ प्रारम्भ हुआ। ऋत्विक् अग्निकुण्ड में स्वाहाकार के साथ देवताओं को आहुति देने लगे। सभी देवता अपना-अपना यज्ञ-भाग लेने वहाँ आ पहुँचे। च्यवनमुनि के कहने से अश्विनीकुमार भी वहाँ आये। देवराज इन्द्र उनके आनेका प्रयोजन समझ गये।

इन्द्र बोले   मुने ! ये दोनों अश्विनीकुमार देवताओं के वैद्य हैं, इसलिये ये यज्ञ-भाग के अधिकारी नहीं हैं, आप इन्हें आहुतियाँ प्रदान न करवायें।

च्यवनमुनि ने इन्द्र से कहाये देवता हैं और इनका मेरे ऊपर बड़ा उपकार है, ये मेरे ही आमन्त्रण पर यहाँ पधारे हैं, इसलिये मैं इन्हें अवश्य यज्ञ-भाग दूंगा । यह सुनकर इन्द्र क्रुद्ध हो उठे और कठोर स्वर में कहने लगे।

इन्द्र बोलेयदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो मैं वज्र से तुम पर प्रहार करुँगा। इन्द्र की ऐसी वाणी सुनकर च्यवनमुनि किंचित् भी भयभीत नहीं हुए और उन्होंने अश्विनीकुमारोंको यज्ञ-भाग दे ही दिया। तब तो इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने ज्यों ही च्यवनमुनि पर प्रहार करने के लिये अपना वज्र उठाया त्यों ही च्यवनमुनि ने अपने तप के प्रभाव से इन्द्र का स्तम्भन कर दिया। इन्द्र हाथ में वज्र लिये खड़े ही रह गये। च्यवनमुनि ने अश्विनीकुमारों को यज्ञ-भाग देकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली और यज्ञ को पूर्ण किया। उसी समय वहाँ ब्रह्माजी उपस्थित हुए।

ब्रह्माजी ने च्यवनमुनि से कहा   महामुने ! आप इन्द्र को स्तम्भन-मुक्त कर दें। अश्विनीकुमारों को यज्ञ-भाग दे दें। इन्द्र ने भी स्तम्भन से मुक्त करने के लिये प्रार्थना की।

इन्द्र ने कहा   मुने ! आपके तप की प्रसिद्धि के लिये ही मैंने इन अश्विनीकुमारोंको यज्ञमें भाग लेने से रोका था, अब आज से सब यज्ञों में अन्य देवताओंके साथ अश्विनीकुमारों को भी यज्ञ-भाग मिला करेगा और इनको देवत्व भी प्राप्त होगा। आपके इस तपके प्रभाव को जो सुनेगा अथवा पढेगा वह भी उत्तम रूप एवं यौवन को प्राप्त करेगा। इतना कहकर देवराज इन्द्र देवलोक को चले गये और च्यवनमुनि सुकन्या तथा राजा शर्यातिके साथ आश्रमपर लौट आये।

वहाँ उन्होंने देखा कि बहुत उत्तम-उत्तम महल बन गये हैं, जिनमें सुन्दर उपवन और वापी आदि विहारके लिये बने हुए हैं। भाँति-भाँति की शय्याएँ बिछी हुई हैं, विविध रत्नों से जटित आभूषणों तथा उत्तम-उत्तम वस्त्रों के ढेर लगे हैं। यह देखकर सुकन्या सहित च्यवनमुनि अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन्होंने यह सब देवराज इन्द्र द्वारा प्रदत्त समझकर उनकी प्रशंसा की।

महामुनि सुमन्तु राजा शतानीक से बोलेराजन् ! इस प्रकार द्वितीया तिथि के दिन अश्विनीकुमारों को देवत्व तथा यज्ञ-भाग प्राप्त हुआ था। अब आप इस द्वितीया तिथि के व्रत का विधान सुनें

शतानीक बोले जो पुरुष उत्तम रूप की इच्छा करे वह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया से व्रत को आरम्भ करे और वर्ष-पर्यन्त संयमित होकर पुष्प-भोजन करे। जो उत्तम हविष्य-पुष्प उस ऋतु में हों उनका आहार करे। इस प्रकार एक वर्ष सोने-चाँदी के पुष्प बनाकर अथवा व्रत कर कमलपुष्पों को ब्राह्मणों को देकर व्रत सम्पन्न करे। इससे अश्विनीकुमार संतुष्ट होकर उत्तम रूप प्रदान करते हैं। व्रती उत्तम विमानों में बैठकर स्वर्ग में जाकर कल्पपर्यन्त विविध सुखोंका उपभोग करता है। फिर मर्त्यलोक में जन्म लेकर वेदवेदांगों का ज्ञाता, महादानी, आधि-व्याधियों से रहित, पुत्र-पौत्रों से युक्त, उत्तम पत्नी वाला ब्राह्मण होता है अथवा मध्यदेशके उत्तम नगरमें राजा होता है।

राजन्! इस पुष्पद्वितीया व्रत का विधान मैंने आपको बतलाया। ऐसी ही फल-द्वितीया भी होती है, जिसे अशून्यशयना-द्वितीया भी कहते हैं। फलद्वितीया को जो श्रद्धापूर्वक व्रत करता है,वह ऋद्धि-सिद्धिको प्राप्तकर अपनी भार्यासहित आनन्द प्राप्त करता है।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १९ सम्पूर्ण।   

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भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १८

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय  १८  

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १८ - ब्रह्माजी की रथयात्रा का विधान और कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा की महिमा का वर्णन है ।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय  १८

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १८     

Bhavishya puran Brahma parva chapter 18

भविष्यपुराणम् पर्व ब्राह्मपर्व अध्यायः १८     

भविष्यपुराणम् पर्व १ (ब्राह्मपर्व) अध्यायः १८     

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अट्ठारहवाँ अध्याय

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १८ भावार्थ सहित    

सुमन्तु मुनि ने कहा हे राजा शतानिक ! कार्तिक मास में जो ब्रह्माजी की रथयात्रा उत्सव करता हैं, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है । कार्तिक की पूर्णिमा को मृगचर्म के आसन पर सावित्री के साथ ब्रह्माजी को रथ में विराजमान करे और विविध वाद्य-ध्वनि के साथ रथयात्रा निकाले । विशिष्ट उत्सव के साथ ब्रह्माजी को रथपर बैठाये और रथ के आगे ब्रह्माजी के परम भक्त ब्राह्मण शाण्डिली पुत्र को स्थापित कर उनकी पूजा करे । ब्राह्मणों के द्वारा स्वस्ति एवं पुण्याहवाचन कराये । उस रात्रि जागरण करे । नृत्य-गीत आदि उत्सव एवं विविध क्रीड़ाएँ ब्रह्माजी के सम्मुख प्रदर्शित करे ।

इस प्रकार रात्रि में जागरण कर प्रतिपदा* के दिन प्रातःकाल ब्रह्माजी का पूजन करना चाहिये । ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये, अनन्तर पुण्य शब्दों के साथ रथयात्रा प्रारम्भ करनी चाहिये ।

चारों वेदों के ज्ञाता उत्तम ब्राह्मण उस रथ को खींचे और रथ के आगे वेद पढ़ते हुए ब्राह्मण चलते रहें । ब्रह्माजी के दक्षिण-भाग में सावित्री तथा वाम-भाग में भोजक की स्थापना करें । रथके आगे शङ्ख, भेरी, मृदङ्ग आदि विविध वाद्य बजते रहें । इस प्रकार सारे नगर में रथ को घुमाना चाहिये और नगर की प्रदक्षिणा करनी चाहिये, अनन्तर उसे अपने स्थान पर ले आना चाहिये । आरती करके ब्रह्माजी को उनके मन्दिर में स्थापित करें । इस रथ-यात्रा को सम्पन्न करने वाले, रथ को खींचने वाले तथा इसका दर्शन करने वाले सभी ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं । दीपावली के दिन ब्रह्माजी के मन्दिर में दीप प्रज्वलित करने वाला ब्रह्मलोक को प्राप्त करता हैं । दुसरे दिन प्रतिपदा को ब्रह्माजी की पूजा करके स्वयं भी वस्त्र-आभूषण से अलंकृत होना चाहिये । यह प्रतिपदा तिथि ब्रह्माजी को बहुत प्रिय है । इसी तिथि से बलि के राज्य का आरम्भ हुआ है । इस दिन ब्रह्माजी का पूजन कर ब्राह्मण-भोजन कराने से विष्णुलोक की प्राप्ति होती है । चैत्र मास में कृष्ण प्रतिपदा के दिन (होली जलाने के दुसरे दिन) चाण्डाल का स्पर्श कर स्नान करने से सभी आधि-व्याधियाँ दूर हो जाती है । उस दिन गौ, महिष आदि को अलंकृत कर उन्हें मण्डप के नीचे रखना चाहिये तथा ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये । चैत्र, आश्विन और कार्तिक इन तीनों महीनों की प्रतिपदा श्रेष्ठ हैं, किंतु इनमें कार्तिक की प्रतिपदा विशेष श्रेष्ठ है । इस दिन किया हुआ स्नान-दान आदि सौ गुने फल को देता है । राजा बलि को इसी दिन राज्य मिला था, इसलिये कार्तिक की प्रतिपदा श्रेष्ठ मानी जाती है ।

* विचारणीय है की अमावस्यान्त माह में कार्तिक पूर्णिमा के उपरान्त कार्तिक कृष्ण पक्ष प्रतिपदा होती है तथा पूर्णिमान्त माह में कार्तिक पूर्णिमा के उपरान्त मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष प्रतिपदा का आरम्भ होता है।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १८ सम्पूर्ण।   

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भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १७

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय  १७  

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १७ - प्रतिपत्कल्प- निरूपण में ब्रह्माजी की पूजा-अर्चा की महिमा का वर्णन है ।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय  १७

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १७     

Bhavishya puran Brahma parva chapter 17

भविष्यपुराणम् पर्व ब्राह्मपर्व अध्यायः १७     

भविष्यपुराणम् पर्व १ (ब्राह्मपर्व) अध्यायः १७     

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व सत्रहवाँ अध्याय

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १७ भावार्थ सहित    

राजा शतानीक ने कहा ब्रह्मन् ! आप प्रतिपदा तिथि में किये जाने वाले कृत्य, ब्रह्माजी के पूजन की विधि और उसके फल का विस्तारपूर्वक वर्णन करें ।

सुमन्तु मुनि बोले हे राजन् ! पूर्व-कल्प में स्थावर-जङ्गमात्मक सम्पूर्ण जगत के नष्ट हो जाने पर सर्वत्र जल ही जल हो गया । उस समय देवताओं में श्रेष्ठ चतुर्मुख ब्रह्माजी प्रकट हुए और उन्होंने अनेक लोकों, देवगणों तथा विविध प्राणियों की सृष्टि की । प्रजापति ब्रह्मा देवताओं के पिता अन्य जीवों के पितामह हैं, इसलिए इनकी सदा पूजा करनी चाहिये । ये ही जगत् की सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले हैं । इनके मन से रुद्रका, वक्षःस्थल से विष्णु का आविर्भाव हुआ । इनके चारों मुखों से अपने छः अङ्गों के साथ चारों वेद प्रकट हुए । सभी देवता, दैत्य, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग आदि इनकी पूजा करते है । यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्ममय है और ब्रह्म में स्थित हैं, अतः ब्रह्माजी सबसे पूज्य हैं । राज्य, स्वर्ग और मोक्ष ये तीनों पदार्थ इनकी सेवा करने से प्राप्त हो जाते हैं । इसलिए सदा प्रसन्नचित्त से यावज्जीवन नियम से ब्रह्माजी की पूजा करनी चाहिये । जो ब्रह्माजी की सदा भक्ति से पूजा करता हैं, वह मनुष्य-स्वरुप में साक्षात् ब्रह्मा ही है । ब्रह्माजी की पूजा से अधिक पुण्य किसी में न समझकर सदा ब्रह्माजी का पूजन करते रहना चाहिये । जो ब्रह्माजी का मन्दिर बनवाकर उसमें विधि-पूर्वक ब्रह्माजी की प्रतिमा की प्रतिष्ठा करता हैं, वह यज्ञ, तप, तीर्थ, दान आदि के फलों से करोड़ों गुना अधिक फल प्राप्त करता हैं । ऐसे पुरुष के दर्शन और स्पर्श से इक्कीस पीढ़ी का उद्धार हो जाता है । ब्रह्माजी की पूजा करने वाला पुरुष बहुत काल तक ब्रह्मलोक में निवास करता है । वहाँ निवास करने के पश्चात् वह ज्ञानयोग के माध्यम से मुक्त हो जाता है अथवा भोग चाहने पर मनुष्यलोक में चक्रवर्ती राजा अथवा वेद वेदाङ्गपारङ्गत कुलीन ब्राह्मण होता है । किसी अन्य कठोर तप और यज्ञों की आवश्यकता नहीं है, केवल ब्रह्माजी की पूजा से ही सभी पदार्थ प्राप्त हो सकते हैं ।जो ब्रह्माजी के मन्दिर में छोटे जीवों की रक्षा करता हुआ सावधानीपूर्वक धीरे-धीरे झाड़ू देता है तथा उपलेपन करता है, वह चान्द्रायण-व्रत का फल प्राप्त करता है । एक पक्ष तक ब्रह्माजी के मन्दिर में जो झाड़ू लगाता है, वह सौ करोड़ युग से भी अधिक ब्रह्मलोक में पूजित होता है और अनन्तर सर्व-गुण-संपन्न, चारों वेदों का ज्ञाता धर्मात्मा राजा के रूप में पृथ्वी पर आता है । भक्ति-पूर्वक ब्रह्माजी का पूजन न करने तक ही मनुष्य संसार में भटकता है । जिस तरह मानव का मन विषयों में मग्न होता है, वैसे ही यदि ब्रह्माजी में मन निमग्न रहे तो ऐसा कौन पुरुष होगा जो मुक्ति नही प्राप्त कर सकता । ब्रह्माजी के जीर्ण एवं खण्डित मन्दिर का उद्धार करने वाला प्राणी मुक्ति प्राप्त करता है । ब्रह्माजी के समान न कोई देवता है न गुरु, न ज्ञान है और न कोई तप ही है ।

प्रतिपदा आदि सभी तिथियों में भक्ति-पूर्वक ब्रह्माजी की पूजा कर पूर्णिमा के दिन विशेषरूप से पूजा करनी चाहिये तथा शङ्ख, घण्टा, भेरी आदि वाद्य-ध्वनियों के साथ आरती एवं स्तुति करनी चाहिये । इस प्रकार व्यक्ति जितने पर्वों पर आरती करता हैं, उतने हजार युग तक ब्रह्मलोक में निवास और आनन्द का उपभोग करता है । कपिला गौ के पञ्चगव्य और कुशा के जल से वेदमन्त्रों के द्वारा ब्रह्माजी को स्नान कराना ब्राह्म-स्नान कहलाता है । अन्य स्नानों से सौ गुना पुण्य इसमें अधिक होता है । यज्ञ एवं अग्निहोत्रादि के लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को कपिला गौ रखनी चाहिये । ब्रह्माजी की मूर्ति का कपिला गाय के घृत से अभ्यङ्ग करना चाहिये, इससे करोड़ों वर्षों के किये गये पापों का विनाश होता है । यदि प्रतिपदा के दिन कोई एक बार भी घी से स्नान कराता है तो उसके इक्कीस पीढ़ी का उद्धार हो जाता है । सुवर्ण-वस्त्रादि से अलंकृत दस हजार सवत्सा गौ वेदज्ञ ब्राह्मणों को देने से जो पुण्य होता है, वही पूज्य ब्रह्माजी को दुग्ध से स्नान कराने से प्राप्त होता है । एक बार भी दूध से ब्रह्माजी को स्नान करने वाला पुरुष सुवर्ण के विमान से विराजमान हो ब्रह्मलोक में पहुँच जाता है । दही से स्नान कराने पर विष्णुलोक की प्राप्ति होती है । शहद से स्नान कराने पर वीरलोक (इन्द्रलोक)- की प्राप्ति होती है । ईख के रस से स्नान कराने पर सूर्यलोक की प्राप्ति होती है । शुद्धोदक से स्नान कराने पर सभी पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में निवास करता है । वस्त्र से छने हुए जल से ब्रह्माजी को स्नान कराने पर वह सदा तृप्त रहता है और सम्पूर्ण विश्व उसके वशीभूत हो जाता है । सर्वौषधियों से स्नान कराने पर ब्रह्मलोक, चन्दन के जल से स्नान कराने पर रुद्रलोक, कमल के पुष्प, नीलकमल, पाटला (लोध्र-लाल), कनेर आदि सुंगधित पुष्पों से स्नान कराने पर ब्रह्मलोक में पूजित होता है । कपूर और अगर के जल से स्नान करानेपर या गायत्री मंत्र से सौ बार जल को अभिमंत्रित कर उस जल से स्नान कराने पर ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है । शीतल जल या कपिला गाय के धारोष्ण दुग्ध से स्नान कराने के अनन्तर घृत से स्नान कराने से सभी पापों से मनुष्य मुक्त हो जाता है । इन तीनों स्नानों को सम्पन्न कर भक्तिपूर्वक पूजा करने से पूजक को अश्वमेध-यज्ञ का फल प्राप्त होता है । मिट्टी के घड़े की अपेक्षा ताँबे के घट से ब्रह्माजी को स्नान कराने पर सौगुना, चाँदी के घट से लाख गुना फल होता है और सुवर्ण-कलश से स्नान कराने पर कोटिगुना फल होता है । ब्रह्माजी के दर्शन से उनका स्पर्श करना श्रेष्ठ है, स्पर्श से पूजन और पूजन से घृतस्नान अधिक फलदायक है । सभी वाचिक और मानसिक पाप घृतस्नान कराने से नष्ट हो जाते है।

राजन् ! इस विधि से स्नान कराकर भक्तिपूर्वक ब्रह्माजी की पूजा इस प्रकार करनी चाहिये पवित्र वस्त्र पहनकर, आसनपर बैठ सम्पूर्ण न्यास करना चाहिये । प्रथम चार हाथ विस्तृत स्थान में एक अष्टदल कमल का निर्माण करे । उसके मध्य नाना वर्ण-युक्त द्वादशदल यन्त्र लिखे और पाँच रंगों से उसको भरे । इस प्रकार यन्त्र-निर्माण कर गायत्री के वर्णों से न्यास करे ।

गायत्री के अक्षरों द्वारा शरीर में न्यास कर देवता के शरीर में भी न्यास करना चाहिये । प्रणव-युक्त गायत्री मंत्र के द्वारा अभिमन्त्रित केशर, अगर, चन्दन, कपूर आदि से समन्वित जल से सभी पूजा-द्रव्यों का मार्जन करना चाहिये । अनन्तर पूजा करनी चाहिये । प्रणव का उच्चारण कर पीठ-स्थापन और प्रणव से ही तेजःस्वरुप ब्रह्माजी का आवाहन करना चाहिये । पद्म पर विराजमान, चार मुखों से युक्त चराचर विश्व की सृष्टि करने वाले श्रीब्रह्माजी का ध्यान कर पूजा करनी चाहिये । जो पुरुष प्रतिपदा तिथि के दिन भक्ति-पूर्वक गायत्री मन्त्र से ब्रह्माजी का पूजन करता हैं, वह चिरकाल तक ब्रह्मलोक में निवास करता है ।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १७ सम्पूर्ण।   

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भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १६

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १६

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १६- पंचमहायज्ञों का वर्णन तथा व्रत-उपवासों के प्रकरण में आहार का निरूपण एवं प्रतिपदा तिथि की उत्पत्ति, व्रत-विधि और माहात्म्य का वर्णन है ।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १६

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १६    

Bhavishya puran Brahma parva chapter 16

भविष्यपुराणम् पर्व ब्राह्मपर्व अध्यायः १६   

भविष्यपुराणम् पर्व १ (ब्राह्मपर्व) अध्यायः १६    

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व सोलहवाँ अध्याय

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १६ भावार्थ सहित

सुमन्तु मुनि ने कहा राजन् ! इस प्रकार स्त्रियों के लक्षण और सदाचार का वर्णन करके ब्रह्माजी अपने लोक, तथा ऋषिगण भी अपने-अपने आश्रमों की ओर चले गये । अब गृहस्थों को कैसा आचरण करना चाहिये, उसे मैं बताता हूँ, आप ध्यानपूर्वक सुनें

गृहस्थों को वैवाहिक अग्नि में विधि-पूर्वक गृह्यकर्मों को करना चाहिये तथा पञ्च-महायज्ञों का भी सम्पादन करना चाहिये । गृहस्थों के यहाँ जीव-हिंसा होने के पाँच स्थान हैं ओखली, चक्की, चूल्हा, झाड़ू तथा जल रखने के स्थान । इस हिंसा-दोष से मुक्ति पाने के लिए गृहस्थों को पञ्च-महायज्ञों – (१) ब्रह्मयज्ञ, (२) पितृयज्ञ, (३) दैवयज्ञ, (४) भूतयज्ञ तथा (५) अतिथियज्ञ को नित्य अवश्य करना चाहिये ।

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञश्च तर्पणम् ।

होमो दैवो बलिर्भौमस्तथान्योऽतिथिपूजनम् ।।७।।

अध्ययन करना तथा अध्यापन करना यह ब्रह्मयज्ञ हैं, तर्पणादि कर्म पितृयज्ञ है । देवताओं के लिए हवनादि कर्म दैवयज्ञ है । बलिवैश्वदेव कर्म भूतयज्ञ है तथा अतिथि एवं अभ्यागतों का स्वागत-सत्कार करना अतिथियज्ञ हैं।

इन पाँच नियमों का पालन करने वाला गृहस्थी घर में रहता हुआ भी पञ्चसूना-दोषों से लिप्त नहीं होता । यदि समर्थ होते हुए भी वह इन पाँच यज्ञों को नहीं करता है तो उसका जीवन ही व्यर्थ है ।

राजा शतानीक ने पूछा जिस ब्राह्मण के घर में अग्निहोत्र नहीं होता, वह मृतक के समान होता है यह आपने कहा है, परंतु फिर वह देवपूजा आदि कार्यों को क्यों करे ? और यदि ऐसी बात है तो देवता, पितर उससे कैसे संतुष्ट होंगे, इसका आप निराकारण करें ।

सुमन्तु मुनि बोले राजन् ! जिन ब्राह्मणों के घर मे अग्निहोत्र न हो उनका उद्धार व्रत, उपवास, नियम, दान तथा देवता की स्तुति, भक्ति आदि से होता है । जिस देवता की जो तिथि हो, उसमें उपवास करने से वे देवता उस पर विशेष-रूप से प्रसन्न होते है

व्रतोपवासनियमैर्नानादानैस्तथा नृप ।

देवादयो भवन्त्येव प्रीतास्तेषां न संशयः ।। १३।।

विशेषादुपवासेन तिथौ किल महीपते ।

प्रीता देवादयस्तेषां भवन्ति कुरुनन्दन ।। १४।।

राजा ने फिर कहा महाराज ! अब आप अलग-अलग तिथियों में किये जाने वाले व्रतों, तिथि-व्रतों में किये जानेवाले भोजनों तथा उपवास की विधियों का वर्णन करें, जिनके श्रवण से तथा जिनका आचरण कर संसार-सागर से मैं मुक्त हो जाऊँ तथा मेरे सभी पाप दूर हो जायँ । साथ ही संसार के जीवों का भी कल्याण हो जाय ।

सुमन्तु मुनि बोले मैं तिथियों में विहित कृत्यों का वर्णन करता हूँ, जिनके सुनने से पाप कट जाते हैं और उपवास के फलों की प्राप्ति हो जाती है ।

प्रतिपदा तिथि को दूध तथा द्वितीया को लवण-रहित भोजन करें । तृतीया के दिन तिलान्न भक्षण करें । इसी प्रकार चतुर्थी को दूध, पञ्चमी को फल, षष्ठी को शाक, सप्तमी को बिल्वाहार करें । अष्टमी को पिष्ट, नवमी को अनग्निपाक, दशमी और एकादशी को घृताहार करें । द्वादशी को खीर, त्रयोदशी को गो-मूत्र, चतुर्दशी को यवान्न भक्षण करें । पूर्णिमा को कुशा का जल पीये तथा अमावस्या को हविष्य-भोजन करे । यह सब तिथियों के भोजन की विधि है । इस विधि से जो पूरे एक पक्ष भोजन करता है, वह दस अश्वमेध-यज्ञों का फल प्राप्त करता है और मन्वन्तर तक स्वर्ग में आनन्द भोगता है । यदि तीन-चार मास तक इस विधि से भोजन करे तो वह सौ अश्वमेध और सौ राजसूय-यज्ञों का फल प्राप्त करता है तथा स्वर्ग में अनेक मन्वन्तरों तक सुख भोग करता है । पुरे आठ महीने इस विधि से भोजन करे तो हजार यज्ञों का फल पाता है और चौदह मन्वन्तर-पर्यन्त स्वर्ग में वहाँ के सुखों का उपभोग करता है । इसी प्रकार यदि एक वर्ष-पर्यन्त नियम-पूर्वक इस भोजन-विधि का पालन करता है तो वह सूर्य-लोक में कई मन्वन्तरों तक आनन्द-पूर्वक निवास करता है । इस उपवास-विधि में चारों वर्णों तथा स्त्री-पुरुषों सभी का अधिकार है । जो इन तिथि-व्रतों का आरम्भ आश्विन की नवमी, माघ की सप्तमी, वैशाख की तृतीया तथा कार्तिक की पूर्णिमा से करता है, वह लंबी आयु प्राप्त कर अन्त में सूर्य-लोक को प्राप्त होता हैं । पूर्वजन्म में जिन पुरुषों ने व्रत, उपवास आदि किया, दान दिया, अनेक प्रकार से ब्राह्मणों, साधू-संतो एवं तपस्वियों को संतुष्ट किया, माता-पिता और गुरु की सेवा-सुश्रूषा की, विधिपूर्वक तीर्थयात्रा की, वे पुरुष स्वर्ग में दीर्घ काल तक रहकर जब पृथ्वी पर जन्म लेते है, तब उनके चिह्न- पुण्य-फल प्रत्यक्ष ही दिखलायी पड़ते है । यहाँ उन्हें हाथी, घोड़े, पालकी, रथ, सुवर्ण, रत्न, कंकण, केयूर, हार, कुण्डल, मुकुट, उत्तम वस्त्र, श्रेष्ठ सुन्दर स्त्री तथा अच्छे सेवक प्राप्त होते हैं । वे आधि-व्याधि से मुक्त होकर दीर्घायु होते हैं । पुत्र-पौत्रादि का सुख देखते हैं और वन्दिजनों के स्तुति-पाठ द्वारा जगाये जाते हैं । इसके विपरीत जिसने व्रत, दान, उपवास आदि सत्कर्म नहीं किया वह कान, अंधा, लूला, लँगड़ा, गूँगा, कुबड़ा तथा रोग और दरिद्रता से पीड़ित रहता है । संसार में आज भी इन दोनों प्रकार के पुरुष प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं । यही पुण्य और पाप की प्रत्यक्ष परीक्षा है ।

राजा ने कहा प्रभो ! आपने अभी संक्षेप में तिथियों को बताया है । अब यह विस्तार से बतलाने की कृपा करें कि किस देवताकी किस तिथि में पूजा करनी चाहिये और व्रत आदि किस विधि से करने चाहिये जिनके करने से मैं पवित्र हो जाऊँ और द्वन्द-रहित होकर यज्ञ के फलों को प्राप्त कर सकूँ ।

सुमन्तु मुनि बोले राजन् ! तिथियों का रहस्य, पूजा का विधान, फल, नियम, देवता तथा अधिकारी आदि के विषय में मैं बताता हूँ, यह सब आज-तक मैंने किसी को नहीं बतलाया, इसे आप सुने

सबसे पहले मैं संक्षेप में सृष्टि का वर्णन करता हूँ । प्रथम परमात्म ने जल उत्पन्नकर उसमें तेज प्रविष्ट किया, उससे एक अण्ड उत्पन्न हुआ, उससे ब्रह्मा उत्पन्न हुए । उन्होंने सृष्टि की इच्छा से उस अण्ड के एक कपाल से भूमि और दूसरे से आकाश की रचना की । तदनन्तर दिशा, उपदिशा, देवता, दानव आदि रचे और जिस दिन यह सब काम किया उसका नाम प्रतिप्रदा तिथि रखा । ब्रह्माजी ने इसे सर्वोत्तम माना और सभी तिथियों के प्रारम्भ में इसका प्रतिपादन किया इसलिये इसका नाम प्रतिपदा हुआ । इसी के बाद सभी तिथियाँ उत्पन्न हुई ।

अब मैं इसके उपवास-विधि और नियमों का वर्णन करता हूँ । कार्तिक-पूर्णिमा, माघ-सप्तमी तथा वैशाख शुक्ल तृतीया से इस प्रतिपदा तिथि के नियम एवं उपवासों को विधि-पूर्वक प्रारम्भ करना चाहिये । यदि प्रतिपदा तिथि से नियम ग्रहण करना है तो प्रतिपदा से पूर्व चतुर्दशी तिथि को भोजन के अनन्तर व्रत का संकल्प लेना चाहिये । अमावस्या को त्रिकाल स्नान करे, भोजन न करे और गायत्री का जप करता रहे । प्रतिपदा के दिन प्रातःकाल गन्ध-माल्य आदि उपचारों से श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा करे और उन्हें यथा-शक्ति दूध दे और बाद में ब्रह्माजी मुझपर प्रसन्न हो’ – ऐसा कहे । स्वयं भी बाद में गाय का दूध पिये । इस विधि से एक वर्ष तक व्रत अन्त में गायत्री सहित ब्रह्माजी का पूजन कर व्रत समाप्त करे ।

इस विधान से व्रत करने पर व्रती के सब पाप दूर हो जाते हैं और उसकी आत्मा शुद्ध हो जाती है । वह दिव्य-शरीर धारण कर विमान में बैठकर देवलोक में देवताओं के साथ आनन्द प्राप्त करता है और जब इस पृथ्वी पर सत्ययुग में जन्म लेता है तो दस जन्म तक वेद-विद्या का पारगामी विद्वान्, धनवान्, दीर्घ आयुष्य, आरोग्यवान्, अनेक भोगों से सम्पन्न, यज्ञ करने वाला, महादानी ब्राह्मण होता है । विश्वामित्र मुनि ने ब्राह्मण होने के लिए बहुत समय तक घोर तपस्या की, किंतु उन्हें ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं हो सका । अतः उन्होंने नियम से इसी प्रतिपदा का व्रत किया । इससे थोड़े से समय में ब्रह्माजी ने उन्हें ब्राह्मण बना दिया । क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र आदि कोई इस तिथि का व्रत करें तो वह सब पापों से मुक्त होकर दुसरे जन्म में ब्राह्मण होता है । हैहय, तालजंघ, तुरुष्क, यवन,शक आदि म्लेच्छ जातिवाले भी इस व्रत के प्रभाव से ब्राह्मण हो सकते हैं । यह तिथि परम पुण्य और कल्याण करने वाली है । जो इसके माहात्म्य को पढ़ता अथवा सुनता है वह ऋद्धि, वृद्धि और सत्कीर्ति पाकर अन्त में सद्गति प्राप्त करता है । *

*[इसका वर्णन ठीक इसी प्रकार वराहपुराण में इससे भी अधिक विस्तार से मिलता है और मुहूर्त-चिन्तामणि एवं अन्य ज्योतिषग्रन्थों में भी रमणीयतापूर्वक प्रपञ्चित है । व्रतकल्पद्रुम, व्रतरत्नाकर, व्रतराज आदि में भी संगृहीत है]

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १६ सम्पूर्ण।   

आगे पढ़ें- भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय 17

भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

भविष्य पुराण के रचयिता महर्षि वेदव्यास ऋषि है। वर्तमान में इस पुराण में कुल 14,000 श्लोक प्राप्त हैं। इस पुराण को ब्रह्म पर्व, मध्यम पर्व, प्रतिसर्ग पर्व तथा उत्तर पर्व इन चार पर्व में विभाजित किया गया है। मध्यमपर्व तीन तथा प्रतिसर्ग पर्व चार इन के मध्य में खण्डों में विभक्त है। इन चार पर्वों में शामिल अध्याय हैं, जिनकी कुल संख्या 485 है। इस पुराण में कथाएँ रोचक तथा प्रभावोत्कपादक हैं।

भविष्य पुराण


भविष्यपुराण

Bhavishya Purana

भविष्य पुराण को चार पर्व में बाटा गया हे, जो निम्नलिखित है-

ब्रह्म पर्व:-

भविष्य पुराण के इस पर्व में कुल 215 अध्याय हैं। भविष्य में होने वाली घटनाओं से संबंधित इस पन्द्रह सहस्र श्लोकों के इस महापुराण में धर्म, आचार, नागपंचमी व्रत, सूर्यपूजा, स्त्री प्रकरण आदि हैं। ब्रह्म पर्व के आरम्भ में महर्षि सुमंतु एवं राजा शतानीक का संवाद किया गया है। इस पर्व में मुख्यत: व्रत-उपवास पूजा विधि, सूर्योपासना का माहात्म्य और उनसे जुड़ी कथाओं का विस्तृत वर्णन है। इसमें सूर्य से सम्बन्धित 169 अध्याय है।

मध्यम पर्व:-

भविष्य पुराण के इस पर्व में समस्त कर्मकाण्ड का निरूपण है। मध्यम पर्व में व्रत और दान से सम्बद्ध विषय और व्रत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया हैं। मध्यम पर्व में मुख्य रूप से श्राद्धकर्म, पितृकर्म, विवाह-संस्कार, यज्ञ, व्रत, स्नान, प्रायश्चित्त, अन्नप्राशन, मन्त्रोपासना, राज कर देना, यज्ञ के दिनों की गणना के बारे में विवरण दिया गया है। इतने विस्तार से व्रतों का वर्णन न किसी पुराण, न किसी धर्मशास्त्रमें मिलता है और न किसी स्वतन्त्र व्रत-संग्रह के ग्रन्थ में।

प्रतिसर्ग पर्व:-

भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व के तृतीय तथा चतुर्थ खण्ड में इतिहास की महत्त्वपूर्ण सामग्री उपस्थित है। इतिहास लेखकों ने सबसे पहले इसी का आधार लिया है। प्रतिसर्ग पर्व मध्यकालीन हर्षवर्धन, महावीर बप्पा रावल, महाराज पृथ्वीराज चौहान,आल्हा- ऊदल, पेशवा माधवराव, आदि हिन्दू राजाओं और अलाउद्दीन, मुहम्मद तुगलक, तैमूरलंग, बाबर तथा अकबर, आदि का प्रामाणिक इतिहास ज्ञात किया गया है। इसमें जगद्गुरु श्री आदिशंकराचार्य, श्रीरामानुजाचार्य, मीराबाई, श्रीचैतन्य महाप्रभु, गुरु नानक देवजी, तुलसीदासजी, सूरदासजी, कबीरदास जी, चंद बरदाई के बारे में वर्णन किया गया है।

उत्तर पर्व:-

भविष्य पुराण के उत्तर पर्व में भगवान विष्णु की माया से नारद जी के मोहित होने का वर्णन मिलता है। इसके बाद स्त्रियों को सौभाग्य प्रदान करने वाले अन्य कई व्रतों का वर्णन भी विस्तारपूर्वक किया गया है। इस पर्व में 208 अध्याय हैं। उत्तर पर्व भविष्य पुराण का अंग है, किन्तु इसे एक भविष्योत्तरपुराण भी माना जाता है।

भविष्यपुराणम्

१. पर्व १ (ब्राह्मपर्व)

२.१. पर्व २ (मध्यमपर्व)/भागः १

२.२. पर्व २ (मध्यमपर्व)/भागः २

२.३. पर्व २ (मध्यमपर्व)/भागः ३

३.१. पर्व ३ (प्रतिसर्गपर्व)/खण्डः १

३.२. पर्व ३ (प्रतिसर्गपर्व)/खण्डः २

३.३. पर्व ३ (प्रतिसर्गपर्व)/खण्डः ३

३.४. पर्व ३ (प्रतिसर्गपर्व)/खण्डः ४

४. पर्व ४ (उत्तरपर्व)

भविष्यपुराणम्

अध्यायः १

अध्यायः २

अध्यायः ३

अध्यायः ४

अध्यायः ५

अध्यायः ६

अध्यायः ७

अध्यायः ८

अध्यायः ९

अध्यायः १०

अध्यायः ११

अध्यायः १२

अध्यायः १३

अध्यायः १४

 

अध्यायः १५

 

अध्यायः १६

 

अध्यायः १७

 

अध्यायः १८

 

अध्यायः १९

 

अध्यायः २०

 

अध्यायः २१

 

अध्यायः २२

 

अध्यायः २३

 

अध्यायः २४

 

अध्यायः २५

 

अध्यायः २६

 

अध्यायः २७

 

अध्यायः २८

 

अध्यायः २९

 

अध्यायः ३०

 

अध्यायः ३१

 

अध्यायः ३२

 

अध्यायः ३३

 

अध्यायः ३४

 

अध्यायः ३५

 

अध्यायः ३६

 

अध्यायः ३७

 

अध्यायः ३८

 

अध्यायः ३९

 

अध्यायः ४०

 

अध्यायः ४१

 

अध्यायः ४२

 

अध्यायः ४३

 

अध्यायः ४४

 

अध्यायः ४५

 

अध्यायः ४६

 

अध्यायः ४७

 

अध्यायः ४८

 

अध्यायः ४९

 

अध्यायः ५०

 

अध्यायः ५१

 

अध्यायः ५२

 

अध्यायः ५३

 

अध्यायः ५४

 

अध्यायः ५५

 

अध्यायः ५६

 

अध्यायः ५७

 

अध्यायः ५८

 

अध्यायः ५९

 

अध्यायः ६०

 

अध्यायः ६१

 

अध्यायः ६२

 

अध्यायः ६३

 

अध्यायः ६४

 

अध्यायः ६५

 

अध्यायः ६६

 

अध्यायः ६७

 

अध्यायः ६८

 

अध्यायः ६९

 

अध्यायः ७०

 

अध्यायः ७१

 

अध्यायः ७२

 

अध्यायः ७३

 

अध्यायः ७४

 

अध्यायः ७५

 

अध्यायः ७६

 

अध्यायः ७७

 

अध्यायः ७८

 

अध्यायः ७९

 

अध्यायः ८०

 

अध्यायः ८१

 

अध्यायः ८२

 

अध्यायः ८३

 

अध्यायः ८४

 

अध्यायः ८५

 

अध्यायः ८६

 

अध्यायः ८७

 

अध्यायः ८८

 

अध्यायः ८९

 

अध्यायः ९०

 

अध्यायः ९१

 

अध्यायः ९२

 

अध्यायः ९३

 

अध्यायः ९४

 

अध्यायः ९५

 

अध्यायः ९६

 

अध्यायः ९७

 

अध्यायः ९८

 

अध्यायः ९९

 

अध्यायः १००

 

अध्यायः १०१

 

अध्यायः १०२

 

अध्यायः १०३

 

अध्यायः १०४

 

अध्यायः १०५

 

अध्यायः १०६

 

अध्यायः १०७

 

अध्यायः १०८

 

अध्यायः १०९

 

अध्यायः ११०

 

अध्यायः १११

 

अध्यायः ११२

 

अध्यायः ११३

 

अध्यायः ११४

 

अध्यायः ११५

 

अध्यायः ११६

 

अध्यायः ११७

 

अध्यायः ११८

 

अध्यायः ११९

 

अध्यायः १२०

 

अध्यायः १२१

 

अध्यायः १२२

 

अध्यायः १२३

 

अध्यायः १२४

 

अध्यायः १२५

 

अध्यायः १२६

 

अध्यायः १२७

 

अध्यायः १२८

 

अध्यायः १२९

 

अध्यायः १३०

 

अध्यायः १३१

 

अध्यायः १३२

 

अध्यायः १३३

 

अध्यायः १३४

 

अध्यायः १३५

 

अध्यायः १३६

 

अध्यायः १३७

 

अध्यायः १३८

 

अध्यायः १३९

 

अध्यायः १४०

 

अध्यायः १४१

 

अध्यायः १४२

 

अध्यायः १४३

 

अध्यायः १४४

 

अध्यायः १४५

 

अध्यायः १४६

 

अध्यायः १४७

 

अध्यायः १४८

 

अध्यायः १४९

 

अध्यायः १५०

 

अध्यायः १५१

 

अध्यायः १५२

 

अध्यायः १५३

 

अध्यायः १५४

 

अध्यायः १५५

 

अध्यायः १५६

 

अध्यायः १५७

 

अध्यायः १५८

 

अध्यायः १५९

 

अध्यायः १६०

 

अध्यायः १६१

 

अध्यायः १६२

 

अध्यायः १६३

 

अध्यायः १६४

 

अध्यायः १६५

 

अध्यायः १६६

 

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अध्यायः १६८

 

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अध्यायः १७०

 

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अध्यायः २१६