श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १४

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १४           

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १४ "राजा वेन की कथा"

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १४

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १४  

श्रीमद्भागवतपुराणम् स्कन्धः ४ अध्यायः १४     

श्रीमद्भागवत महापुराण चौथा स्कन्ध चौदहवाँ अध्याय

चतुर्थ स्कन्ध:  श्रीमद्भागवत महापुराण                       

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १४ श्लोक का हिन्दी अनुवाद सहित

मैत्रेय उवाच -

(अनुष्टुप्)

भृग्वादयस्ते मुनयो लोकानां क्षेमदर्शिनः ।

गोप्तर्यसति वै नॄणां पश्यन्तः पशुसाम्यताम् ॥ १ ॥

वीरमातरमाहूय सुनीथां ब्रह्मवादिनः ।

प्रकृत्यसम्मतं वेनं अभ्यषिञ्चन् पतिं भुवः ॥ २ ॥

श्रुत्वा नृपासनगतं वेनमत्युग्रशासनम् ।

निलिल्युर्दस्यवः सद्यः सर्पत्रस्ता इवाखवः ॥ ३ ॥

स आरूढनृपस्थान उन्नद्धोऽष्टविभूतिभिः ।

अवमेने महाभागान्स्तब्धः सम्भावितः स्वतः ॥ ४ ॥

एवं मदान्ध उत्सिक्तो निरङ्‌कुश इव द्विपः ।

पर्यटन् रथमास्थाय कम्पयन् इव रोदसी ॥ ५ ॥

न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजाः क्वचित् ।

इति न्यवारयद् धर्मं भेरीघोषेण सर्वशः ॥ ६ ॥

वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्य विचेष्टितम् ।

विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचुः स्म सत्रिणः ॥ ७ ॥

अहो उभयतः प्राप्तं लोकस्य व्यसनं महत् ।

दारुणि उभयतो दीप्ते इव तस्करपालयोः ॥ ८ ॥

अराजकभयादेष कृतो राजातदर्हणः ।

ततोऽप्यासीद्‌भयं त्वद्य कथं स्यात् स्वस्ति देहिनाम् ॥ ९ ॥

अहेरिव पयःपोषः पोषकस्याप्यनर्थभृत् ।

वेनः प्रकृत्यैव खलः सुनीथागर्भसम्भवः ॥ १० ॥

निरूपितः प्रजापालः स जिघांसति वै प्रजाः ।

तथापि सान्त्वयेमामुं नास्मान् तत्पातकं स्पृशेत् ॥ ११ ॥

तद् विद्वद्‌भिः असद्‌वृत्तो वेनोऽस्माभिः कृतो नृपः ।

सान्त्वितो यदि नो वाचं न ग्रहीष्यत्यधर्मकृत् ॥ १२ ॥

लोकधिक्कारसन्दग्धं दहिष्यामः स्वतेजसा ।

एवं अध्यवसायैनं मुनयो गूढमन्यवः ॥ १३ ॥

उपव्रज्याब्रुवन् वेनं सान्त्वयित्वा च सामभिः ॥ १३ ॥

मुनय ऊचुः -

नृपवर्य निबोधैतद् यत्ते विज्ञापयाम भोः ।

आयुःश्रीबलकीर्तीनां तव तात विवर्धनम् ॥ १४ ॥

धर्म आचरितः पुंसां वाङ्‌मनःकायबुद्धिभिः ।

लोकान् विशोकान् वितरति अथ अनन्त्यमसङ्‌गिनाम् ॥ १५ ॥

स ते मा विनशेद्वीर प्रजानां क्षेमलक्षणः ।

यस्मिन् विनष्टे नृपतिः ऐश्वर्यादवरोहति ॥ १६ ॥

राजन् असाध्वमात्येभ्यः चोरादिभ्यः प्रजा नृपः ।

रक्षन् यथा बलिं गृह्णन् इह प्रेत्य च मोदते ॥ १७ ॥

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- वीरवर विदुर जी! सभी लोकों की कुशल चाहने वाले भृगु आदि मुनियों ने देखा कि अंग के चले जाने से अब पृथ्वी की रक्षा करने वाला कोई नहीं रह गया है, सब लोग पशुओं के समान उच्छ्रंखल होते जा रहे हैं। तब उन्होंने माता सुनीथा की सम्मति से, मन्त्रियों के सहमत न होने पर भी वेन को भूमण्डल के राजपद पर अभिषिक्त कर दिया। वेन बड़ा कठोर शासक था। जब चोर-डाकुओं ने सुना कि वही राजसिंहासन पर बैठा है, तब सर्प से डरे हुए चूहों के समान वे सब तुरंत ही जहाँ-तहाँ छिप गये।

राज्यासन पाने पर वेन आठों लोकपालों की ऐश्वर्यकला के कारण उन्मत्त हो गया और अभिमानवश अपने को ही सबसे बड़ा मानकर महापुरुषों का अपमान करने लगा। वह ऐश्वर्यमद से अंधा हो रथ पर चढ़कर निरंकुश गजराज के समान पृथ्वी और आकाश को कँपाता हुआ सर्वत्र विचरने लगा। ‘कोई भी द्विजातिय वर्ण का पुरुष कभी प्रकार का यज्ञ, दान और हवन न करे’ अपने राज्य में यह ढिंढोरा पिटवाकर उसने सारे धर्म-कर्म बंद करवा दिये। दुष्ट वेन का ऐसा अत्याचार देख सारे ऋषि-मुनि एकत्र हुए और संसार पर संकट आया समझकर करुणावश आपस में कहने लगे- ‘अहो! जैसे दोनों ओर जलती हुई लकड़ी के बीच में रहने वाले चीटी आदि जीव महान् संकट में पड़ जाते हैं, वैसे ही इस समय सारी प्रजा एक ओर राजा के और दूसरी ओर चोर-डाकुओं के अत्याचार से महान् संकट में पड़ रही है। हमने अराजकता के भय से ही अयोग्य होने पर भी वेन को राजा बनाया था; किन्तु अब उससे भी प्रजा को भय हो गया। ऐसी अवस्था में प्रजा को किस प्रकार सुख-शान्ति मिल सकती है? सुनीथा की कोख से उत्पन्न हुआ यह वेन स्वभाव से ही दुष्ट है। परन्तु साँप को दूध पिलाने के समान इसको पालना, पालने वालों के लिये अनर्थ का कारण हो गया। हमने इसे प्रजा की रक्षा करने के लिये नियुक्त किया था, यह आज उसी को नष्ट करने पर तुला हुआ है। इतना सब होने पर भी हमें इसे समझाना अवश्य चाहिये; ऐसा करने से इसके किये हुए पाप हमें स्पर्श नहीं करेंगे। हमने जान-बूझकर दुराचारी वेन को राजा बनाया था। किन्तु यदि समझाने पर भी यह हमारी बात नहीं मानेगा, तो लोक के धिक्कार से दग्ध हुए इस दुष्ट को हम अपने तेज से भस्म कर देंगे।’ ऐसा विचार करके मुनि लोग वेन के पास गये और अपने क्रोध को छिपाकर उसे प्रिय वचनों से समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे।

मुनियों ने कहा ;- राजन्! हम आपसे जो बात कहते हैं, उस पर ध्यान दिजिय। इससे आपकी आयु, श्री, बल और कीर्ति की वृद्धि होगी। तात! यदि मनुष्य मन, वाणी, शरीर और बुद्धि से धर्म का आचरण करे, तो उसे स्वर्गादि शोकरहित लोकों की प्राप्ति होती है। यदि उसका निष्कामभाव हो, तब तो वही धर्म उसे अनन्त मोक्षपद पर पहुँचा देता है। इसलिये वीरवर! प्रजा का कल्याणरूप वह धर्म आपके कारण नष्ट नहीं होना चाहिये। धर्म के नष्ट होने से राजा भी ऐश्वर्य से च्युत हो जाता है। जो राजा दुष्ट मन्त्री और चोर आदि से अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए न्यायाकूल रहता है, वह इस लोक में और परलोक में दोनों जगह सुख पाता है।

यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान् यज्ञपूरुषः ।

इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः ॥ १८ ॥

तस्य राज्ञो महाभाग भगवान् भूतभावनः ।

परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने ॥ १९ ॥

तस्मिन् तुष्टे किमप्राप्यं जगतां ईश्वरेश्वरे ।

लोकाः सपाला ह्येतस्मै हरन्ति बलिमादृताः ॥ २० ॥

तं सर्वलोकामरयज्ञसङ्‌ग्रहं

     त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम् ।

यज्ञैर्विचित्रैर्यजतो भवाय ते

     राजन् स्वदेशान् अनुरोद्धुमर्हसि ॥ २१ ॥

यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभिः

     वितायमानेन सुराः कला हरेः ।

स्विष्टाः सुतुष्टाः प्रदिशन्ति वाञ्छितं

     तद्धेलनं नार्हसि वीर चेष्टितुम् ॥ २२ ॥

वेन उवाच -

(अनुष्टुप्)

बालिशा बत यूयं वा अधर्मे धर्ममानिनः ।

ये वृत्तिदं पतिं हित्वा जारं पतिमुपासते ॥ २३ ॥

अवजानन्त्यमी मूढा नृपरूपिणमीश्वरम् ।

नानुविन्दन्ति ते भद्रं इह लोके परत्र च ॥ २४ ॥

को यज्ञपुरुषो नाम यत्र वो भक्तिरीदृशी ।

भर्तृस्नेहविदूराणां यथा जारे कुयोषिताम् ॥ २५ ॥

विष्णुर्विरिञ्चो गिरिश इन्द्रो वायुर्यमो रविः ।

पर्जन्यो धनदः सोमः क्षितिरग्निरपाम्पतिः ॥ २६ ॥

एते चान्ये च विबुधाः प्रभवो वरशापयोः ।

देहे भवन्ति नृपतेः सर्वदेवमयो नृपः ॥ २७ ॥

तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः ।

बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक् पुमान् ॥ २८ ॥

मैत्रेय उवाच -

इत्थं विपर्ययमतिः पापीयानुत्पथं गतः ।

अनुनीयमानस्तद्याच्ञां न चक्रे भ्रष्टमङ्‌गलः ॥ २९ ॥

इति तेऽसत्कृतास्तेन द्विजाः पण्डितमानिना ।

भग्नायां भव्ययाच्ञायां तस्मै विदुर चुक्रुधुः ॥ ३० ॥

हन्यतां हन्यतामेष पापः प्रकृतिदारुणः ।

जीवन् जगदसावाशु कुरुते भस्मसाद् ध्रुवम् ॥ ३१ ॥

नायमर्हत्यसद्‌वृत्तो नरदेववरासनम् ।

योऽधियज्ञपतिं विष्णुं विनिन्दत्यनपत्रपः ॥ ३२ ॥

को वैनं परिचक्षीत वेनमेकमृतेऽशुभम् ।

प्राप्त ईदृशमैश्वर्यं यदनुग्रहभाजनः ॥ ३३ ॥

इत्थं व्यवसिता हन्तुं हृषयो रूढमन्यवः ।

निजघ्नुर्हुङ्‌कृतैर्वेनं हतमच्युतनिन्दया ॥ ३४ ॥

जिसके राज्य अथवा नगर में वर्णाश्रम-धर्मों का पालन करने वाले पुरुष स्वधर्मपालन के द्वारा भगवान् यज्ञपुरुष की आरधना करते हैं, महाभाग! अपनी आज्ञा का पालन करने वाले उस राजा से भगवान् प्रसन्न रहते हैं; क्योंकि वे ही सारे विश्व की आत्मा तथा सम्पूर्ण भूतों के रक्षक हैं। भगवान् ब्रह्मादि जगदीश्वरों के भी ईश्वर हैं, उनके प्रसन्न होने पर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। तभी तो इन्द्रादि लोकपालों के सहित समस्त लोक उन्हें बड़े आदर से पूजपोहार समर्पण करते हैं।

राजन्! भगवान् श्रीहरि समस्त लोक, लोकपाल और यज्ञों के नियन्ता है; वे वेदत्रयीरूप, द्रव्यरूप और तपःस्वरूप हैं। इसलिये आपके जो देशवासी आपकी उन्नति के लिये अनेक प्रकार के यज्ञों से भगवान् का यजन करते हैं, आपको उनके अनुकूल ही रहना चाहिये। जब आपके राज्य में ब्राह्मण लोग यज्ञों का अनुष्ठान करेंगे, तब उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान् के अंशस्वरूप देवता आपको मनचाहा फल देंगे। अतः वीरवर! आपको यज्ञादि धर्मानुष्ठान बंद करके देवताओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिये।

वेन ने कहा ;- तुम लोग बड़े मूर्ख हो! खेद है, तुमने अधर्म में ही धर्मबुद्धि कर रखी है। तभी तो तुम जीविका देने वाले मुझ साक्षात् पति को छोड़कर किसी दूसरे जारपति की उपासना करते हो। जो लोग मूर्खतावश राजारूप परमेश्वर का अनादर करते हैं, उन्हें न तो इस लोक में सुख मिलता है और न परलोक में ही। अरे! जिसमें तुम लोगों की इतनी भक्ति है, वह यज्ञपुरुष है कौन? यह तो ऐसी ही बात हुई जैसे कुलटा स्त्रियाँ अपने विवाहिता पति से प्रेम न करके किसी परपुरुष में आसक्त हो जायें। विष्णु, ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, मेघ, कुबेर, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि और वरुण तथा इनके अतिरिक्त जो दूसरे वर और शाप देने में समर्थ देवता हैं, वे सब-के-सब राजा के शरीर में रहते हैं; इसलिये राजा सर्वदेवमय है और देवता उसके अंशमात्र हैं। इसलिये ब्राह्मणों! तुम मत्सरता छोड़कर अपने सभी कर्मों द्वारा एक मेरा ही पूजन करो और और मुझी को बलि समर्पण करो। भला मेरे सिवा और कौन अग्रपूजा का अधिकारी हो सकता है।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- इस प्रकार विपरीत बुद्धि होने के कारण वह अत्यन्त पापी और कुमार्गगामी हो गया था। उसका पुण्य क्षीण हो चुका था, इसलिये मुनियों के बहुत विनयपूर्वक प्रार्थना करने पर भी उसने उनकी बात पर ध्यान न दिया।

कल्याणरूप विदुर जी! अपने को बड़ा बुद्धिमान् समझने वाले वेन ने जब उन मुनियों का इस प्रकार अपमान किया, तब अपनी माँग को व्यर्थ हुई देख वे उस पर अत्यन्त कुपित हो गये। ‘मार डालो! इस स्वभाव से ही दुष्ट पापी को मार डालो! यह यदि जीता रह गया तो कुछ ही दिनों में संसार को अवश्य भस्म कर डालेगा। यह दुराचारी किसी प्रकार राजसिंहासन के योग्य नहीं है, क्योंकि यह निर्जलज्ज साक्षात् यज्ञपति श्रीविष्णु भगवान् की निन्दा करता है। अहो! जिनकी कृपा से इसे ऐसा ऐश्वर्य मिला, उन श्रीहरि की निन्दा अभागे वेन को छोड़कर और कौन कर सकता है’? इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोध को प्रकट कर उन्होंने उसे मारने का निश्चय कर लिया। वह तो भगवान् की निन्दा करने के कारण पहले ही मर चुका था, इसलिये केवल हुंकारों से ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया।

ऋषिभिः स्वाश्रमपदं गते पुत्रकलेवरम् ।

सुनीथा पालयामास विद्यायोगेन शोचती ॥ ३५ ॥

एकदा मुनयस्ते तु सरस्वत् सलिलाप्लुताः ।

हुत्वाग्नीन् सत्कथाश्चक्रुः उपविष्टाः सरित्तटे ॥ ३६ ॥

वीक्ष्योत्थितान् तदोत्पातान् आहुर्लोक भयङ्‌करान् ।

अप्यभद्रमनाथाया दस्युभ्यो न भवेद्‌भुवः ॥ ३७ ॥

एवं मृशन्त ऋषयो धावतां सर्वतोदिशम् ।

पांसुः समुत्थितो भूरिः चोराणामभिलुम्पताम् ॥ ३८ ॥

तदुपद्रवमाज्ञाय लोकस्य वसु लुम्पताम् ।

भर्तर्युपरते तस्मिन् अन्योन्यं च जिघांसताम् ॥ ३९ ॥

चोरप्रायं जनपदं हीनसत्त्वमराजकम् ।

लोकान् आवारयञ्छक्ता अपि तद्दोषदर्शिनः ॥ ४० ॥

ब्राह्मणः समदृक् शान्तो दीनानां समुपेक्षकः ।

स्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्नभाण्डात्पयो यथा ॥ ४१ ॥

नाङ्‌गस्य वंशो राजर्षेः एष संस्थातुमर्हति ।

अमोघवीर्या हि नृपा वंशेऽस्मिन् केशवाश्रयाः ॥ ४२ ॥

विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः ।

ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद्‍बाहुको नरः ॥ ४३ ॥

काककृष्णोऽतिह्रस्वाङ्‌गो ह्रस्वबाहुर्महाहनुः ।

ह्रस्वपान् निम्ननासाग्रो रक्ताक्षस्ताम्रमूर्धजः ॥ ४४ ॥

तं तु तेऽवनतं दीनं किं करोमीति वादिनम् ।

निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत् ॥ ४५ ॥

तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः ।

येनाहरत् जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम् ॥ ४६ ॥

जब मुनिगण अपने-अपने आश्रमों को चले गये, तब इधर वेन की शोकाकुल माता सुनीथा मन्त्रादि के बल से तथा अन्य युक्तियों से अपने पुत्र के शव की रक्षा करने लगी।

एक दिन वे मुनिगण सरस्वती के पवित्र जल में स्नान कर अग्निहोत्र से निवृत्त हो नदी के तीर पर बैठे हुए हरिचर्चा कर रहे थे। उन दिनों लोकों में आतंक फैलाने वाले बहुत-से उपद्रव होते देखकर वे आपस में कहने लगे, ‘आजकल पृथ्वी का कोई रक्षक नहीं है; इसलिये चोर-डाकुओं के कारण उसका कुछ अमंगल तो नहीं होने वाला है? ऋषि लोग ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने सब दिशाओं में धावा करने वाले चोरों और डाकुओं के कारण उठी हुई बड़ी भारी धूल देखी। देखते ही वे समझ गये कि राजा वेन के मर जाने के कारण देश में अराजकता फैल गयी है, राज्य शक्तिहीन हो गया है और चोर-डाकू बढ़ गये हैं; यह सारा उपद्रव लोगों का धन लूटने वाले तथा एक-दूसरे के खून के प्यासे लुटेरों का ही है।

अपने तेज से अथवा तपोबल से लोगों को ऐसी कुप्रवृत्ति से रोकने में समर्थ होने पर भी ऐसा करने में हिंसादि दोष देखकर उन्होंने इसका कोई निवारण नहीं किया। फिर सोचा कि ‘ब्राह्मण यदि समदर्शी और शान्तस्वभाव भी हो तो भी दोनों की उपेक्षा करने से उसका तप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जैसे फूटे हुए घड़े में से जल बह जाता है। फिर राजर्षि अंग का वंश भी नष्ट नहीं होना चाहिये, क्योंकि इसमें अनेक अमोघ-शक्ति और भगवत्परायण राजा हो चुके हैं’।

ऐसा निश्चय कर उन्होंने मृत राजा की जाँघ को बड़े जोर से मथा तो उसमें से एक बौना पुरुष उत्पन्न हुआ। वह कौए के समान काला था; उसके सभी अंग और खासकर भुजाएँ बहुत छोटी थीं, जबड़े बहुत बड़े, टाँगे छोटी, नाक चपटी, नेत्र लाल और केश ताँबे के-से रंग के थे। उसने बड़ी दीनता और नम्रताभाव से पूछा कि ‘मैं क्या करूँ?’ तो ऋषियों ने कहा- ‘निषीद (बैठ जा)।’ इसी से वह ‘निषाद’ कहलाया। उसने जन्म लेते ही राजा वेन के भयंकर पापों को अपने ऊपर ले लिया, इसीलिये उसके वंशधर नैषाद भी हिंसा, लूट-पाट आदि पापकर्मों में रत रहते हैं; अतः वे गाँव और नगर में न टिककर वन और पर्वतों में ही निवास करते हैं।

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुचरिते निषादोत्पत्तिर्नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

इस प्रकार श्रीमद्‌भागवत महापुराण का परमहंस संहिता स्कन्ध ४ अध्याय १४ समाप्त हुआ ॥ १४ ॥

आगे जारी-पढ़े............... स्कन्ध ४ अध्याय १५ 

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १३

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १३          

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १३"ध्रुववंश का वर्णन, राजा अंग का चरित्र"

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १३

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १३ 

श्रीमद्भागवतपुराणम् स्कन्धः ४ अध्यायः १३    

श्रीमद्भागवत महापुराण चौथा स्कन्ध तेरहवाँ अध्याय

चतुर्थ स्कन्ध:  श्रीमद्भागवत महापुराण    

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १३ श्लोक का हिन्दी अनुवाद सहित

सूत उवाच -

निशम्य कौषारविणोपवर्णितं

     ध्रुवस्य वैकुण्ठपदाधिरोहणम् ।

प्ररूढभावो भगवत्यधोक्षजे

     प्रष्टुं पुनस्तं विदुरः प्रचक्रमे ॥ १ ॥

विदुर उवाच -

(अनुष्टुप्)

के ते प्रचेतसो नाम कस्यापत्यानि सुव्रत ।

कस्यान्ववाये प्रख्याताः कुत्र वा सत्रमासत ॥ २ ॥

मन्ये महाभागवतं नारदं देवदर्शनम् ।

येन प्रोक्तः क्रियायोगः परिचर्याविधिर्हरेः ॥ ३ ॥

स्वधर्मशीलैः पुरुषैः भगवान् यज्ञपूरुषः ।

इज्यमानो भक्तिमता नारदेनेरितः किल ॥ ४ ॥

यास्ता देवर्षिणा तत्र वर्णिता भगवत्कथाः ।

मह्यं शुश्रूषवे ब्रह्मन् कार्त्स्न्येनाचष्टुमर्हसि ॥ ५ ॥

मैत्रेय उवाच -

ध्रुवस्य चोत्कलः पुत्रः पितरि प्रस्थिते वनम् ।

सार्वभौमश्रियं नैच्छद् अधिराजासनं पितुः ॥ ६ ॥

स जन्मनोपशान्तात्मा निःसङ्‌गः समदर्शनः ।

ददर्श लोके विततं आत्मानं लोकमात्मनि ॥ ७ ॥

आत्मानं ब्रह्म निर्वाणं प्रत्यस्तमितविग्रहम् ।

अवबोधरसैकात्म्यं आनन्दं अनुसन्ततम् ॥ ८ ॥

अव्यवच्छिन्नयोगाग्नि दग्धकर्ममलाशयः ।

स्वरूपमवरुन्धानो नात्मनोऽन्यं तदैक्षत ॥ ९ ॥

जडान्धबधिरोन्मत्त मूकाकृतिरतन्मतिः ।

लक्षितः पथि बालानां प्रशान्तार्चिः इवानलः ॥ १० ॥

मत्वा तं जडमुन्मत्तं कुलवृद्धाः समंत्रिणः ।

वत्सरं भूपतिं चक्रुः यवीयांसं भ्रमेः सुतम् ॥ ११ ॥

स्वर्वीथिर्वत्सरस्येष्टा भार्यासूत षडात्मजान् ।

पुष्पार्णं तिग्मकेतुं च इषमूर्जं वसुं जयम् ॥ १२ ॥

पुष्पार्णस्य प्रभा भार्या दोषा च द्वे बभूवतुः ।

प्रातर्मध्यन्दिनं सायं इति ह्यासन् प्रन्प्रभासुताः ॥ १३ ॥

प्रदोषो निशिथो व्युष्ट इति दोषासुतास्त्रयः ।

व्युष्टः सुतं पुष्करिण्यां सर्वतेजसमादधे ॥ १४ ॥

स चक्षुः सुतमाकूत्यां पत्‍न्यां मनुं अवाप ह ।

मनोरसूत महिषी विरजान्नड्वला सुतान् ॥ १५ ॥

पुरुं कुत्सं त्रितं द्युम्नं सत्यवन्तमृतं व्रतम् ।

अग्निष्टोममतीरात्रं प्रद्युम्नं शिबिमुल्मुकम् ॥ १६ ॥

उल्मुकोऽजनयत् पुत्रान् पुष्करिण्यां षडुत्तमान् ।

अङ्‌गं सुमनसं ख्यातिं क्रतुं अङ्‌गिरसं गयम् ॥ १७ ॥

सुनीथाङ्‌गस्य या पत्‍नी सुषुवे वेनमुल्बणम् ।

यद्दौःशील्यात्स राजर्षिः निर्विण्णो निरगात्पुरात् ॥ १८ ॥

यमङ्‌ग शेपुः कुपिता वाग्वज्रा मुनयः किल ।

गतासोस्तस्य भूयस्ते ममन्थुर्दक्षिणं करम् ॥ १९ ॥

अराजके तदा लोके दस्युभिः पीडिताः प्रजाः ।

जातो नारायणांशेन पृथुराद्यः क्षितीश्वरः ॥ २० ॥

श्रीसूत जी कहते हैं ;- शौनक जी! श्रीमैत्रेय मुनि के मुख से ध्रुव जी के विष्णुपद पर आरूढ़ होने का वृत्तान्त सुनकर विदुर जी के हृदय में भगवान् विष्णु की भक्ति का उद्रेक हो आया और उन्होंने फिर मैत्रेय जी से प्रश्न करना आरम्भ किया।

विदुर जी ने पूछा ;- भगवत्परायण मुने! ये प्रचेता कौन थे? किसके पुत्र थे? किसके वंश में प्रसिद्ध थे और इन्होंने कहाँ यज्ञ किया था? भगवान् के दर्शन से कृतार्थ नारद जी परम भागवत हैं- ऐसा मैं मानता हूँ। उन्होंने पांचरात्र का निर्माण करके श्रीहरि की पूजा पद्धतिरूप क्रियायोग का उपदेश किया है। जिस समय प्रचेतागण स्वधर्म का आचरण करते हुए भगवान् यज्ञेश्वर की आराधना कर रहे थे, उसी समय भक्तप्रवर नारद जी ने ध्रुव का गुणगान किया था। ब्रह्मन्! उस स्थान पर उन्होंने भगवान् की जिन-जिन लीला-कथाओं का वर्णन किया था, वे सब पूर्णरूप से मुझे सुनाइये; मुझे उनके सुनने की बड़ी इच्छा है।

श्रीमैत्रेय जी ने कहा ;- विदुर जी! महाराज ध्रुव के वन चले जाने पर उनके पुत्र उत्कल ने अपने पिता के सार्वभौम वैभव और राज्यसिंहासन को अस्वीकार कर दिया। वह जन्म से ही शान्तचित्त, आसक्तिशून्य और समदर्शी था; तथा सम्पूर्ण लोकों को अपनी आत्मा में और अपनी आत्मा को सपूर्ण लोकों में स्थित देखता था। उसके अन्तःकरण का वासनारूप मल अखण्ड योगाग्नि से भस्म हो गया था। इसलिये वह अपनी आत्मा को विशुद्ध बोधरस के साथ अभिन्न, आनन्दमय और सर्वत्र व्याप्त देखता था। सब प्रकार के भेद से रहित प्रशान्त ब्रह्म को ही वह अपना स्वरूप समझता था; तथा अपनी आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं देखता था। वह अज्ञानियों को रास्ते आदि साधारण स्थानों में बिना लपट की आग के समान मूर्ख, अंधा, बहिरा, पागल अथवा गूँगा-सा प्रतीत होता था- वास्तव में ऐसा था नहीं। इसलिये कुल के बड़े-बूढ़े तथा मन्त्रियों ने उसे मूर्ख और पागल समझकर उसके छोटे भाई भ्रमिपुत्र वत्सर को राजा बनाया।

वत्सर की प्रेयसी भार्या स्वर्वीथि के गर्भ से पुष्पार्ण, तिग्मकेतु, इष, ऊर्ज, वसु और जय नाम के छः पुत्र हुए। पुष्पार्ण के प्रभा और दोषा नाम की दो स्त्रियाँ थीं; उनमें से प्रभा के प्रातः, मध्यन्दिन और सायं- ये तीन पुत्र हुए। दोषा के प्रदोष, निशीथ और वयुष्ट- ये तीन पुत्र हुए। वयुष्ट ने अपनी भार्या पुष्करिणी से सर्वतेजा नाम का पुत्र उत्पन्न किया। उसकी पत्नी आकूति से चक्षुः नामक पुत्र हुआ। चाक्षुष मन्वन्तर में वही मनु हुआ। चक्षु मनु की स्त्री नड्वला से पुरु, कुत्स, त्रित, द्युम्न, सत्यवान्, ऋत, व्रत, अग्निष्टोम, अतिरात्र, प्रद्युम्न, शिबि और उल्मुक- ये बारह सत्त्वगुणी बालक उत्पन्न हुए। इसमें उल्मुक ने अपनी पत्नी पुष्करिणी से अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अंगिरा और गय- ये छः उत्तम पुत्र उत्पन्न किये। अंग की पत्नी सुनीथा ने क्रूरकर्मा वेन को जन्म दिया, जिसकी दुष्टता से उद्विग्न होकर राजर्षि अंग नगर छोड़कर चले गये थे।

प्यारे विदुर जी! मुनियों के वाक्य वज्र के समान अमोघ होते हैं; उन्होंने कुपित होकर वेन को शाप दिया और जब वह मर गया, तब कोई राजा न रहने के कारण लोक में लुटेरों के द्वारा प्रजा को बहुत कष्ट होने लगा। यह देखकर उन्होंने वेन की दाहिन भुजा का मन्थन किया, जिससे भगवान् विष्णु के अंशावतार आदि सम्राट् महाराज पृथु प्रकट हुए।

विदुर उवाच -

तस्य शीलनिधेः साधोः ब्रह्मण्यस्य महात्मनः ।

राज्ञः कथमभूद् दुष्टा प्रजा यद्विमना ययौ ॥ २१ ॥

किं वांहो वेन उद्दिश्य ब्रह्मदण्डं अयूयुजन् ।

दण्डव्रतधरे राज्ञि मुनयो धर्मकोविदाः ॥ २२ ॥

नावध्येयः प्रजापालः प्रजाभिरघवानपि ।

यदसौ लोकपालानां बिभर्त्योजः स्वतेजसा ॥ २३ ॥

एतदाख्याहि मे ब्रह्मन् सुनीथात्मज चेष्टितम् ।

श्रद्दधानाय भक्ताय त्वं परावरवित्तमः ॥ २४ ॥

मैत्रेय उवाच -

अङ्‌गोऽश्वमेधं राजर्षिः आजहार महाक्रतुम् ।

नाजग्मुर्देवतास्तस्मिन् आहूता ब्रह्मवादिभिः ॥ २५ ॥

तं ऊचुः विस्मितास्तत्र यजमानमथर्त्विजः ।

हवींषि हूयमानानि न ते गृह्णन्ति देवताः ॥ २६ ॥

राजन्हवींष्यदुष्टानि श्रद्धयाऽऽसादितानि ते ।

छन्दांस्ययातयामानि योजितानि धृतव्रतैः ॥ २७ ॥

न विदामेह देवानां हेलनं वयमण्वपि ।

यन्न गृह्णन्ति भागान् स्वान् ये देवाः कर्मसाक्षिणः ॥ २८ ॥

मैत्रेय उवाच -

अङ्‌गो द्विजवचः श्रुत्वा यजमानः सुदुर्मनाः ।

तत्प्रष्टुं व्यसृजद् वाचं सदस्यान् तदनुज्ञया ॥ २९ ॥

नागच्छन्त्याहुता देवा न गृह्णन्ति ग्रहानिह ।

सदसस्पतयो ब्रूत किमवद्यं मया कृतम् ॥ ३० ॥

सदसस्पतय ऊचुः -

नरदेवेह भवतो नाघं तावन् मनाक् स्थितम् ।

अस्त्येकं प्राक्तनमघं यदिहेदृक् त्वमप्रजः ॥ ३१ ॥

तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सुप्रजं नृप ।

इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक् ॥ ३२ ॥

तथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः ।

यद् यज्ञपुरुषः साक्षाद् अपत्याय हरिर्वृतः ॥ ३३ ॥

तांस्तान् कामान् गरिर्दद्यान् यान् कामयते जनः ।

आराधितो यथैवैष तथा पुंसां फलोदयः ॥ ३४ ॥

इति व्यवसिता विप्राः तस्य राज्ञः प्रजातये ।

पुरोडाशं निरवपन् शिपिविष्टाय विष्णवे ॥ ३५ ॥

तस्मात्पुरुष उत्तस्थौ हेममाल्यमलाम्बरः ।

हिरण्मयेन पात्रेण सिद्धमादाय पायसम् ॥ ३६ ॥

स विप्रानुमतो राजा गृहीत्वाञ्जलिनौदनम् ।

अवघ्राय मुदा युक्तः प्रादात्पत्‍न्या उदारधीः ॥ ३७ ॥

सा तत्पुंसवनं राज्ञी प्राश्य वै पत्युरादधे ।

गर्भं काल उपावृत्ते कुमारं सुषुवेऽप्रजा ॥ ३८ ॥

विदुर जी ने पूछा ;- ब्रह्मन्! महाराज अंग तो बड़े शीलसम्पन्न, साधुस्वभाव, ब्राह्मण-भक्त और महात्मा थे। उनके वेन जैसा दुष्ट पुत्र कैसे हुआ, जिसके कारण दुःखी होकर उन्हें नगर छोड़ना पड़ा। राजदण्डधारी वेन का भी ऐसा क्या अपराध था, जो धर्मज्ञ मुनीश्वरों ने उसके प्रति शापरूप ब्रह्मदण्ड का प्रयोग किया। प्रजा का कर्तव्य है कि वह प्रजापालक राजा से कोई पाप बन जाये तो भी उसका तिरस्कार न करे; क्योंकि वह अपने प्रभाव से आठ लोकपालों के तेज को धारण करता है। ब्रह्मन्! आप भूत-भविष्य की बातें जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ हैं, इसलिये आप मुझे सुनीथा के पुत्र वेन की सब करतूतें सुनाइये। मैं आपका श्रद्धालु भक्त हूँ।

श्रीमैत्रेय जी ने कहा ;- विदुर जी! एक बार राजर्षि अंग ने अश्वमेध महायज्ञ का अनुष्ठान किया। उसमें वेदवादी ब्राह्मणों के आवाहन करने पर भी देवता लोग अपना भाग लेने नहीं आये।

तब ऋत्विजों ने विस्मित होकर यजमान अंग से कहा- ‘राजन्! हम आहुतियों के रूप में आपका जो घृत आदि पदार्थ हवन कर रहे हैं, उसे देवता लोग स्वीकार नहीं करते। हम जानते हैं आपकी होम-सामग्री दूषित नहीं है; आपने उसे बड़ी श्रद्धा से जुटाया है तथा वेदमन्त्र भी किसी प्रकार बलहीन नहीं हैं; क्योंकि उनका प्रयोग करने वाले ऋत्विज् गण याजकोचित सभी नियमों का पूर्णतया पालन करते हैं। हमें ऐसी कोई बात नहीं दीखती कि इस यज्ञ में देवताओं का किंचित् भी तिरस्कार हुआ है- फिर भी कर्माध्यक्ष देवता लोग क्यों अपना भाग नहीं ले रहे हैं?

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- ऋत्विजों की बात सुनकर यजमान अंग बहुत उदास हुए। तब उन्होंने याजकों की अनुमति से मौन तोड़कर सदस्यों से पूछा। ‘सदस्यों! देवता लोग आवाहन करने पर भी यज्ञ में नहीं आ रहे हैं और न सोमपात्र ही ग्रहण करते हैं; आप बतलाइये मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है?

सदस्यों ने कहा ;- राजन्! इस जन्म में तो आपसे तनिक भी अपराध नहीं हुआ; हाँ पूर्वजन्म का एक अपराध अवश्य है, जिसके कारण आप ऐसे सर्वगुण-सम्पन्न होने पर भी पुत्रहीन हैं। आपका कल्याण हो! इसलिये पहले आप सुपुत्र प्राप्त करने का कोई उपाय कीजिये। यदि आप पुत्र की कामना से यज्ञ करेंगे, तो भगवान् यज्ञेश्वर आपको अवश्य पुत्र प्रदान करेंगे। जब सन्तान के लिये साक्षात् यज्ञपुरुष श्रीहरि का आवाहन किया जायेगा, तब देवता लोग स्वयं ही अपना-अपना यज्ञ-भाग ग्रहण करेंगे। भक्त जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, श्रीहरि उसे वही-वही पदार्थ देते है। उनकी जिस प्रकार आराधना की जाती है उसी प्रकार उपासक को फल भी मिलता है।

इस प्रकार राजा अंग को पुत्र प्राप्ति कराने का निश्चय कर ऋत्विजों ने पशु में यज्ञरूप से रहने वाले श्रीविष्णु भगवान् के पूजन के लिये पुरोडश नामक चरु समर्पण किया। अग्नि में आहुति डालते ही अग्निकुण्ड से सोने के हार और शुभ्र वस्त्रों से विभूषित एक पुरुष प्रकट हुए; वे एक स्वर्णपात्र में सिद्ध खीर लिये हुए थे। उदार बुद्धि राजा अंग ने याजकों की अनुमति से अपनी अंजलि में वह खीर ले ली और उसे स्वयं सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी पत्नी को दे दिया। पुत्रहीना रानी ने वह पुत्रप्रदायिनी खीर खाकर अपने पति के सहवास से गर्भ धारण किया। उससे यथा समय उसके एक पुत्र हुआ।

स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रतः ।

अधर्मांशोद्‌भवं मृत्युं तेनाभवद् अधार्मिकः ॥ ३९ ॥

स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः ।

हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ॥ ४० ॥

आक्रीडे क्रीडतो बालान् वयस्यान् अतिदारुणः ।

प्रसह्य निरनुक्रोशः पशुमारममारयत् ॥ ४१ ॥

तं विचक्ष्य खलं पुत्रं शासनैः विविधैर्नृपः ।

यदा न शासितुं कल्पो भृशं आसीत् सुदुर्मनाः ॥ ४२ ॥

प्रायेणाभ्यर्चितो देवो येऽप्रजा गृहमेधिनः ।

कदपत्यभृतं दुःखं ये न विन्दन्ति दुर्भरम् ॥ ४३ ॥

यतः पापीयसी कीर्तिः अधर्मश्च महान् नृणाम् ।

यतो विरोधः सर्वेषां यत आधिरनन्तकः ॥ ४४ ॥

कस्तं प्रजापदेशं वै मोहबन्धनमात्मनः ।

पण्डितो बहु मन्येत यदर्थाः क्लेशदा गृहाः ॥ ४५ ॥

कदपत्यं वरं मन्ये सदपत्याच्छुचां पदात् ।

निर्विद्येत गृहान्मर्त्यो यत्क्लेशनिवहा गृहाः ॥ ४६ ॥

एवं स निर्विण्णमना नृपो गृहात्

     निशीथ उत्थाय महोदयोदयात् ।

अलब्धनिद्रोऽनुपलक्षितो नृभिः

     हित्वा गतो वेनसुवं प्रसुप्ताम् ॥ ४७ ॥

विज्ञाय निर्विद्य गतं पतिं प्रजाः

     पुरोहितामात्यसुहृद्‍गणादयः ।

विचिक्युरुर्व्यामतिशोककातरा

     यथा निगूढं पुरुषं कुयोगिनः ॥ ४८ ॥

अलक्षयन्तः पदवीं प्रजापतेः

     हतोद्यमाः प्रत्युपसृत्य ते पुरीम् ।

ऋषीन् समेतान् अभिवन्द्य साश्रवो

     न्यवेदयन् पौरव भर्तृविप्लवम् ॥ ४९ ॥

वह बालक बाल्यावस्था से ही अधर्म के वंश में उत्पन्न हुए अपने नाना मृत्यु का अनुगामी था (सुनीथा मृत्यु की ही पुत्री थी); इसलिये वह भी अधार्मिक ही हुआ। वह दुष्ट वेन धनुष-बाण चढ़ाकर वन में जाता और व्याध के समान बेचारे भोले-भाले हरिणों की हत्या करता। उसे देखते ही पुरवासी लोग ‘वेन आया! वेन आया!’ कहकर पुकार उठते। वह ऐसा क्रूर और निर्दयी था कि मैदान में खेलते हुए अपनी बराबरी के बालकों को पशुओं की भाँति बलात् मार डालता।

वेन की ऐसी दुष्ट प्रकृति देखकर महाराज अंग ने उसे तरह-तरह से सुधारने की चेष्टा की; परन्तु वे उसे सुमार्ग पर लाने में समर्थ न हुए। इससे उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ। (वे मन-ही-मन कहने लगे-) ‘जिन गृहस्थों के पुत्र नहीं हैं, उन्होंने अवश्य ही पूर्वजन्म में श्रीहरि की आराधना की होगी; इसी से उन्हें कुपूत की करतूतों से होने वाले असह्य क्लेश नहीं सहने पड़ते। जिसकी करनी से माता-पिता का सारा सुयश मिट्टी में मिल जाये, उन्हें अधर्म का भागी होना पड़े, सबसे विरोध हो जाये, कभी न छूटने वाली चिन्ता मोल लेनी पड़े और घर भी दुःखदायी हो जाये-ऐसी नाममात्र की सन्तान के लिये कौन समझदार पुरुष ललचावेगा? वह तो आत्मा के लिये एक प्रकार का मोहमय बन्धन ही है। मैं तो सपूत की अपेक्षा कुपूत को ही अच्छा समझता हूँ; क्योंकि सपूत को छोड़ने में बड़ा क्लेश होता है। कुपूत घर को नरक बना देता है, इसलिये उससे सहज ही छुटकारा हो जाता है’।

इस प्रकार सोचते-सोचते महाराज अंग को रात में नींद नहीं आयी। उनका चित्त गृहस्थी से विरक्त हो गया। वे आधी रात के समय बिछौने से उठे। इस समय वेन की माता नींद में बेसुध पड़ी थी। राजा ने सबका मोह छोड़ दिया और उसी समय किसी को भी मालूम न हो, इस प्रकार चुपचाप उस महान् ऐश्वर्य से भरे राजमहल से निकलकर वन को चल दिये। महाराज विरक्त होकर घर से निकल गये हैं, यह जानकर सभी प्रजाजन, पुरोहित, मन्त्री और सुहृद्गण आदि अत्यन्त शोकाकुल होकर पृथ्वी पर उनकी खोज करने लगे। ठीक वैसे ही, जैसे योग का यथार्थ रहस्य न जानने वाले पुरुष अपने हृदय में छिपे हुए भगवान् को बाहर खोजते हैं।

जब उन्हें अपने स्वामी का कहीं पता न लगा, तब वे निराश होकर नगर में लौट आये और वहाँ जो मुनिजन एकत्रित हुए थे, उन्हें यथावत् प्रणाम करके उन्होंने आँखों में आँसू भरकर महाराज के न मिलने का वृत्तान्त सुनाया।

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीमद्‌भागवत महापुराण का परमहंस संहिता स्कन्ध ४ अध्याय १३ समाप्त हुआ ॥ १३ ॥

आगे जारी-पढ़े............... स्कन्ध ४ अध्याय १४