श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १७

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १७              

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १७ "महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना और पृथ्वी के द्वारा उनकी स्तुति करना"

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १७

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १७     

श्रीमद्भागवतपुराणम् स्कन्धः ४ अध्यायः १७        

श्रीमद्भागवत महापुराण चौथा स्कन्ध सत्रहवाँ अध्याय

चतुर्थ स्कन्ध:  श्रीमद्भागवत महापुराण                       

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १७ श्लोक का हिन्दी अनुवाद सहित  

मैत्रेय उवाच -

(अनुष्टुप्)

एवं स भगवान् वैन्यः ख्यापितो गुणकर्मभिः ।

छन्दयामास तान् कामैः प्रतिपूज्याभिनन्द्य च ॥ १ ॥

ब्राह्मणप्रमुखान् वर्णान् भृत्यामात्यपुरोधसः ।

पौरान् जानपदान् श्रेणीः प्रकृतीः समपूजयत् ॥ २ ॥

विदुर उवाच -

कस्माद्दधार गोरूपं धरित्री बहुरूपिणी ।

यां दुदोह पृथुस्तत्र को वत्सो दोहनं च किम् ॥ ३ ॥

प्रकृत्या विषमा देवी कृता तेन समा कथम् ।

तस्य मेध्यं हयं देवः कस्य हेतोरपाहरत् ॥ ४ ॥

सनत्कुमाराद्‍भगवतो ब्रह्मन् ब्रह्मविदुत्तमात् ।

लब्ध्वा ज्ञानं सविज्ञानं राजर्षिः कां गतिं गतः ॥ ५ ॥

यच्चान्यदपि कृष्णस्य भवान् भगवतः प्रभोः ।

श्रवः सुश्रवसः पुण्यं पूर्वदेहकथाश्रयम् ॥ ६ ॥

भक्ताय मेऽनुरक्ताय तव चाधोक्षजस्य च ।

वक्तुमर्हसि योऽदुह्यद् वैन्यरूपेण गामिमाम् ॥ ७ ॥

सूत उवाच -

चोदितो विदुरेणैवं वासुदेवकथां प्रति ।

प्रशस्य तं प्रीतमना मैत्रेयः प्रत्यभाषत ॥ ८ ॥

मैत्रेय उवाच -

यदाभिषिक्तः पृथुरङ्‌ग विप्रैः

     आमंत्रितो जनतायाश्च पालः ।

प्रजा निरन्ने क्षितिपृष्ठ एत्य

     क्षुत्क्षामदेहाः पतिमभ्यवोचन् ॥ ९ ॥

वयं राजञ्जाठरेणाभितप्ता

     यथाग्निना कोटरस्थेन वृक्षाः ।

त्वामद्य याताः शरणं शरण्यं

     यः साधितो वृत्तिकरः पतिर्नः ॥ १० ॥

तन्नो भवानीहतु रातवेऽन्नं

     क्षुधार्दितानां नरदेवदेव ।

यावन्न नङ्‌क्ष्यामह उज्झितोर्जा

     वार्तापतिस्त्वं किल लोकपालः ॥ ११ ॥

मैत्रेय उवाच -

(अनुष्टुप्)

पृथुः प्रजानां करुणं निशम्य परिदेवितम् ।

दीर्घं दध्यौ कुरुश्रेष्ठ निमित्तं सोऽन्वपद्यत ॥ १२ ॥

इति व्यवसितो बुद्ध्या प्रगृहीतशरासनः ।

सन्दधे विशिखं भूमेः क्रुद्धस्त्रिपुरहा यथा ॥ १३ ॥

प्रवेपमाना धरणी निशाम्योदायुधं च तम् ।

गौः सत्यपाद्रवद्‍भीता मृगीव मृगयुद्रुता ॥ १४ ॥

तामन्वधावत्तद्वैन्यः कुपितोऽत्यरुणेक्षणः ।

शरं धनुषि सन्धाय यत्र यत्र पलायते ॥ १५ ॥

सा दिशो विदिशो देवी रोदसी चान्तरं तयोः ।

धावन्ती तत्र तत्रैनं ददर्शानूद्यतायुधम् ॥ १६ ॥

लोके नाविन्दत त्राणं वैन्यान्मृत्योरिव प्रजाः ।

त्रस्ता तदा निववृते हृदयेन विदूयता ॥ १७ ॥

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- इस प्रकार जब वन्दीजन ने महराज पृथु के गुण और कर्मों का बखान करके उनकी प्रशंसा की, तब उन्होंने भी उनकी बड़ाई करके तथा उन्हें मनचाही वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया। उन्होंने ब्राह्मणादि चारों वर्णों, सेवकों, मन्त्रियों, पुरोहितों, पुरवासियों, देशवासियों, भिन्न-भिन्न व्यवसायियों तथा अन्यान्य आज्ञानुवर्तियों का भी सत्कार किया।

विदुर जी ने पूछा ;- ब्रह्मन्! पृथ्वी तो अनेक रूप धारण कर सकती है, उसने गौ का रूप ही क्यों धारण किया? और जब महाराज पृथु ने उसे दुहा, तब बछड़ा कौन बना? और दुहने का पात्र क्या हुआ? पृथ्वी देवी तो पहले स्वभाव से ही ऊँची-नीची थी। उसे उन्होंने समतल किस प्रकार किया और इन्द्र उनके यज्ञसम्बन्धी घोड़े को क्यों हर ले गये? ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमार जी से ज्ञान और विज्ञान प्राप्त करके वे राजर्षि किस गति को प्राप्त हुए? पृथुरूप से सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने ही अवतार ग्रहण किया था; अतः पुण्यकीर्ति श्रीहरि के उस पृथु-अवतार से सम्बन्ध रखने वाले जो और भी पवित्र-चरित्र हों, वे सभी आप मुझसे कहिये। मैं आपका और श्रीकृष्णचन्द्र का बड़ा अनुरक्त भक्त हूँ।

श्रीसूत जी कहते हैं ;- जब विदुर जी ने भगवान् वासुदेव की कथा कहने के लिये इस प्रकार प्रेरणा की, तब श्रीमैत्रेय जी प्रसन्नचित्त से उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे।

श्रीमैत्रेय जी ने कहा ;- विदुर जी! ब्राह्मणों ने महाराज पृथु का राज्याभिषेक करके उन्हें प्रजा का रक्षक उद्घोषित किया। इन दिनों पृथ्वी अन्नहीन हो गयी थी, इसलिये भूख के कारण प्रजाजनों के शरीर सूखकर काँटे हो गये थे। ‘राजन्! जिस प्रकार कोटर में सुलगती हुई आग से पेड़ जल जाता है, उसी प्रकार हम पेट की भीषण ज्वाला से जले जा रहे हैं। आप शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं और हमारे अन्नदाता प्रभु बनाये गये हैं, इसलिये हम आपकी शरण में आये हैं। आप समस्त लोकों की रक्षा करने वाले हैं, आप ही हमारी जीविका के भी स्वामी हैं। अतः राजराजेश्वर! आप हम क्षुधापीड़ितों को शीघ्र ही अन्न देने का प्रबन्ध कीजिये; ऐसा न हो कि अन्न मिलने से पहले ही हमारा अन्त हो जाये’।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- कुरुवर! प्रजा का करुणक्रन्दन सुनकर महाराज पृथु बहुत देर तक विचार करते रहे। अन्त में उन्हें अन्नाभाव का कारण मालूम हो गया। ‘पृथ्वी ने स्वयं ही अन्न एवं औषधादि को अपने भीतर छिपा लिया है’ अपनी बुद्धि से इस बात का निश्चय करके उन्होंने अपना धनुष उठाया और त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकर के समान अत्यन्त क्रोधित होकर पृथ्वी को लक्ष्य बनाकर बाण चढ़ाया। उन्हें शस्त्र उठाये देख पृथ्वी काँप उठी और जिस प्रकार व्याध के पीछा करने पर हरिणी भागती है, उसी प्रकार वह डरकर गौ का रूप धारण करके भागने लगी। यह देखकर महाराज पृथु की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। वे जहाँ-तहाँ पृथ्वी गयी, वहाँ-वहाँ धनुष पर बाण चढ़ाये उसके पीछे लगे रहे। दिशा, विदिशा, स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में जहाँ-जहाँ भी वह दौड़कर जाती, वहीं उसे महाराज पृथु हथियार उठाये अपने पीछे दिखायी देते। जिस प्रकार मनुष्य को मृत्यु से कोई नहीं बचा सकता, उसी प्रकार उसे त्रिलोकी में वेनपुत्र पृथु से बचाने वाला कोई भी न मिला।

उवाच च महाभागं धर्मज्ञापन्नवत्सल ।

त्राहि मामपि भूतानां पालनेऽवस्थितो भवान् ॥ १८ ॥

स त्वं जिघांससे कस्माद् दीनामकृतकिल्बिषाम् ।

अहनिष्यत्कथं योषां धर्मज्ञ इति यो मतः ॥ १९ ॥

प्रहरन्ति न वै स्त्रीषु कृतागःस्वपि जन्तवः ।

किमुत त्वद्विधा राजन् करुणा दीनवत्सलाः ॥ २० ॥

मां विपाट्याजरां नावं यत्र विश्वं प्रतिष्ठितम् ।

आत्मानं च प्रजाश्चेमाः कथं अम्भसि धास्यसि ॥ २१ ॥

पृथुरुवाच -

वसुधे त्वां वधिष्यामि मच्छासनपराङ्‌मुखीम् ।

भागं बर्हिषि या वृङ्‌क्ते न तनोति च नो वसु ॥ २२ ॥

यवसं जग्ध्यनुदिनं नैव दोग्ध्यौधसं पयः ।

तस्यामेवं हि दुष्टायां दण्डो नात्र न शस्यते ॥ २३ ॥

त्वं खल्वोषधिबीजानि प्राक्सृष्टानि स्वयम्भुवा ।

न मुञ्चस्यात्मरुद्धानि मामवज्ञाय मन्दधीः ॥ २४ ॥

अमूषां क्षुत्परीतानां आर्तानां परिदेवितम् ।

शमयिष्यामि मद्‍बाणैः भिन्नायास्तव मेदसा ॥ २५ ॥

पुमान्योषिदुत क्लीब आत्मसम्भावनोऽधमः ।

भूतेषु निरनुक्रोशो नृपाणां तद्वधोऽवधः ॥ २६ ॥

त्वां स्तब्धां दुर्मदां नीत्वा मायागां तिलशः शरैः ।

आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजाः ॥ २७ ॥

एवं मन्युमयीं मूर्तिं कृतान्तमिव बिभ्रतम् ।

प्रणता प्राञ्जलिः प्राह मही सञ्जातवेपथुः ॥ २८ ॥

धरोवाच -

नमः परस्मै पुरुषाय मायया

     विन्यस्तनानातनवे गुणात्मने ।

नमः स्वरूपानुभवेन निर्धुत

     द्रव्यक्रियाकारकविभ्रमोर्मये ॥ २९ ॥

येनाहमात्मायतनं विनिर्मिता

     धात्रा यतोऽयं गुणसर्गसङ्‌ग्रहः ।

स एव मां हन्तुमुदायुधः स्वराड्

     उपस्थितोऽन्यं शरणं कमाश्रये ॥ ३० ॥

य एतदादावसृजच्चराचरं

     स्वमाययात्माश्रययावितर्क्यया ।

तयैव सोऽयं किल गोप्तुमुद्यतः

     कथं नु मां धर्मपरो जिघांसति ॥ ३१ ॥

नूनं बतेशस्य समीहितं जनैः

     तन्मायया दुर्जययाकृतात्मभिः ।

न लक्ष्यते यस्त्वकरोदकारयद्

     योऽनेक एकः परतश्च ईश्वरः ॥ ३२ ॥

सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभिः

     द्रव्यक्रियाकारक चेतनात्मभिः ।

तस्मै समुन्नद्धनिरुद्धशक्तये

     नमः परस्मै पुरुषाय वेधसे ॥ ३३ ॥

स वै भवानात्मविनिर्मितं जगद्

     भूतेन्द्रियान्तःकरणात्मकं विभो ।

संस्थापयिष्यन्नज मां रसातलाद्

     अभ्युज्जहाराम्भस आदिसूकरः ॥ ३४ ॥

अपामुपस्थे मयि नाव्यवस्थिताः

     प्रजा भवानद्य रिरक्षिषुः किल ।

स वीरमूर्तिः समभूद् धराधरो

     यो मां पयस्युग्रशरो जिघांससि ॥ ३५ ॥

नूनं जनैरीहितमीश्वराणां

     अस्मद्विधैस्तद्‍गुणसर्गमायया ।

न ज्ञायते मोहितचित्तवर्त्मभिः

     तेभ्यो नमो वीरयशस्करेभ्यः ॥ ३६ ॥

तब वह अत्यन्त भयभीत होकर दुःखित चित्त से पीछे की ओर लौटी और महाभाग पृथु जी से कहने लगी- ‘धर्म के तत्त्व को जानने वाले शरणागतवत्सल राजन्! आप तो सभी प्राणियों की रक्षा करने में तत्पर हैं, आप मेरी भी रक्षा कीजिये। मैं अत्यन्त दीन और निरपराध हूँ, आप मुझे क्यों मरना चाहते हैं? इसके सिवा आप तो धर्मज्ञ माने जाते हैं; फिर मुझ स्त्री का वध आप कैसे कर सकेंगे? स्त्रियाँ कोई अपराध करें, तो साधारण जीव भी उन पर हाथ नहीं उठाते; फिर आप जैसे करुणामय और दीनवत्सल तो ऐसा कर ही कैसे सकते हैं? मैं तो सुदृढ़ नौका के समान हूँ, सारा जगत् मेरे ही आधार पर स्थित हैं। मुझे तोड़कर आप अपने को और अपनी प्रजा को जल के ऊपर कैसे रखेंगे?

महाराज पृथु ने कहा ;- पृथ्वी! तू मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने वाली है। तू यज्ञ में देवतारूप से भाग लेती है, किन्तु उसके बदले में हमें अन्न नहीं देती; इसलिये आज मैं तुझे मार डालूँगा। तू जो प्रतिदिन हरी-हरी घास खा जाती है और अपने थन का दूध नहीं देती- ऐसी दुष्टता करने पर तुझे दण्ड देना अनुचित नहीं कहा जा सकता। तू नासमझ है, तूने पूर्वकाल में ब्रह्मा जी के उत्पन्न किये हुए अन्नादि के बीजों को अपने में लीन कर लिया है, और अब मेरी भी परवा न करके उन्हें अपने गर्भ से निकालती नहीं। अब मैं अपने बाणों से तुझे छिन्न-भिन्न कर तेरे मेदे से इन क्षुधातुर और दीन प्रजाजनों का करुण-क्रन्दन शान्त करूँगा। जो दुष्ट अपना ही पोषण करने वाला तथा अन्य प्राणियों के प्रति निर्दय हो- वह पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक कोई भी हो- उसे मारना राजाओं के लिये न मारने के ही समान है। तू बड़ी गर्वीली और मदोन्मत्ता है; इस समय माया से ही यह गौ का रूप बनाये हुए है। मैं बाणों से तेरे टुकड़े-टुकड़े करके अपने योगबल से प्रजा को धारण करूँगा।

इस समय पृथु काल की भाँति क्रोधमयी मूर्ति धारण किये हुए थे। उनके ये शब्द सुनकर धरती काँपने लगी और उसने अत्यन्त विनीतभाव से हाथ जोड़कर कहा।

पृथ्वी ने कहा ;- आप साक्षात् परमपुरुष हैं तथा अपनी माया से अनेक प्रकार के शरीर धारणकर गुणमय जान पड़ते हैं; वास्तव में आत्मानुभव के द्वारा आप अधिभूत, अध्यात्म और अधिदैवसम्बन्धी अभिमान और उससे उत्पन्न हुए राग-द्वेषादि से सर्वथा रहित हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ। आप सम्पूर्ण जगत् के विधाता हैं; आपने ही यह त्रिगुणात्मक सृष्टि रची है और मुझे समस्त जीवों का आश्रय बनाया है। आप सर्वथा स्वतन्त्र हैं। प्रभो! अब आप ही अस्त्र-शस्त्र लेकर मुझे मारने को तैयार हो गये, तब मैं और किसकी शरण में जाऊँ?

कल्प के आरम्भ में आपने-अपने आश्रित रहने वाली अनिर्वचिया माया से ही इस चराचर जगत् की रचना की थी और उस माया के ही द्वारा आप इसका पालन करने के लिये तैयार हुए हैं। आप धर्मपरायण हैं; फिर भी मुझ गोरूपधारिणी को किस प्रकार मारना चाहते हैं? आप एक होकर भी मायावश अनेक रूप जान पड़ते हैं तथा आपने स्वयं ब्रह्मा को रचकर उनसे विश्व की रचना करायी है। आप साक्षात् सर्वेश्वर हैं, आपकी लीलाओं को अजितेन्द्रिय लोग कैसे जान सकते हैं? उनकी बुद्धि तो आपकी दुर्जय माया से विक्षिप्त हो रही है। आप ही पंचभूत, इन्द्रिय, उनके अधिष्ठातृ देवता, बुद्धि और अहंकाररूप अपनी शक्तियों के द्वारा क्रमशः जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं। भिन्न-भिन्न कार्यों के लिये समय-समय पर आपकी शक्तियों का आविर्भाव-तिरोभाव हुआ करता है। आप साक्षात् परमपुरुष और जगाद्विधाता हैं, आपको मेरा नमस्कार है।

अजन्मा प्रभो! आप ही अपने रचे हुए भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप जगत् की स्थिति के लिये आदिवराह रूप होकर मुझे रसातल से जल के बाहर लाये थे। इस प्रकार एक बार तो मेरा उद्धार करके आपने धराधर नाम पाया था; आज वही आप वीरमूर्ति से जल के ऊपर नौका के समान स्थित मेरे ही आश्रय रहने वाली प्रजा की रक्षा करने के अभिप्राय से पैने-पैने बाण चढ़ाकर दूध न देने के अपराध में मुझे मारना चाहते हैं। इस त्रिगुणात्मक सृष्टि की रचना करने वाली आपकी माया से मेरे-जैसे साधारण जीवों के चित्त मोहग्रस्त हो रहे हैं। मुझ-जैसे लोग तो आपके भक्तों की लीलाओं का भी आशय नहीं समझ सकते, फिर आपकी किसी क्रिया का उद्देश्य न समझें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। अतः जो इन्द्रिय-संयमादि के द्वारा वीरोचित यज्ञ का विस्तार करते हैं, ऐसे आपके भक्तों को भी नमस्कार है।

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुविजये धरित्रीनिग्रहो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीमद्‌भागवत महापुराण का परमहंस संहिता स्कन्ध ४ अध्याय १७ समाप्त हुआ ॥ १७ ॥

आगे जारी-पढ़े............... स्कन्ध ४ अध्याय १८  

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १६

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १६             

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १६ "वन्दीजन द्वारा महाराज पृथु की स्तुति"

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १६

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: षोडश अध्यायः

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १६    

श्रीमद्भागवतपुराणम् स्कन्धः ४ अध्यायः १६       

श्रीमद्भागवत महापुराण चौथा स्कन्ध सोलहवाँ अध्याय

चतुर्थ स्कन्ध:  श्रीमद्भागवत महापुराण                       

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १६ श्लोक का हिन्दी अनुवाद सहित   

मैत्रेय उवाच -

(अनुष्टुप्)

इति ब्रुवाणं नृपतिं गायका मुनिचोदिताः ।

तुष्टुवुस्तुष्टमनसः तद् वाग् अमृतसेवया ॥ १ ॥

नालं वयं ते महिमानुवर्णने

     यो देववर्योऽवततार मायया ।

वेनाङ्‌गजातस्य च पौरुषाणि ते

     वाचस्पतीनामपि बभ्रमुर्धियः ॥ २ ॥

अथाप्युदारश्रवसः पृथोर्हरेः

     कलावतारस्य कथामृतादृताः ।

यथोपदेशं मुनिभिः प्रचोदिताः

     श्लाघ्यानि कर्माणि वयं वितन्महि ॥ ३ ॥

(अनुष्टुप्)

एष धर्मभृतां श्रेष्ठो लोकं धर्मेऽनुवर्तयन् ।

गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता तत्परिपन्थिनाम् ॥ ४ ॥

एष वै लोकपालानां बिभर्त्येकस्तनौ तनूः ।

काले काले यथाभागं लोकयोः उभयोर्हितम् ॥ ५ ॥

वसु काल उपादत्ते काले चायं विमुञ्चति ।

समः सर्वेषु भूतेषु प्रतपन् सूर्यवद्विभुः ॥ ॥ ६ ॥

तितिक्षत्यक्रमं वैन्य उपर्याक्रमतामपि ।

भूतानां करुणः शश्वद् आर्तानां क्षितिवृत्तिमान् ॥ ७ ॥

देवेऽवर्षत्यसौ देवो नरदेववपुर्हरिः ।

कृच्छ्रप्राणाः प्रजा ह्येष रक्षिष्यति अञ्जसेन्द्रवत् ॥ ८ ॥

आप्याययत्यसौ लोकं वदनामृतमूर्तिना ।

सानुरागावलोकेन विशदस्मितचारुणा ॥ ९ ॥

अव्यक्तवर्त्मैष निगूढकार्यो

     गम्भीरवेधा उपगुप्तवित्तः ।

अनन्तमाहात्म्यगुणैकधामा

     पृथुः प्रचेता इव संवृतात्मा ॥ १० ॥

(अनुष्टुप्)

दुरासदो दुर्विषह आसन्नोऽपि विदूरवत् ।

नैवाभिभवितुं शक्यो वेनारण्युत्थितोऽनलः ॥ ११ ॥

अन्तर्बहिश्च भूतानां पश्यन् कर्माणि चारणैः ।

उदासीन इवाध्यक्षो वायुरात्मेव देहिनाम् ॥ १२ ॥

नादण्ड्यं दण्डयत्येष सुतमात्मद्विषामपि ।

दण्डयत्यात्मजमपि दण्ड्यं धर्मपथे स्थितः ॥ १३ ॥

अस्याप्रतिहतं चक्रं पृथोरामानसाचलात् ।

वर्तते भगवानर्को यावत्तपति गोगणैः ॥ १४ ॥

रञ्जयिष्यति यल्लोकं अयं आत्मविचेष्टितैः ।

अथ अमुं आहू राजानं मनोरञ्जनकैः प्रजाः ॥ १५ ॥

दृढव्रतः सत्यसन्धो ब्रह्मण्यो वृद्धसेवकः ।

शरण्यः सर्वभूतानां मानदो दीनवत्सलः ॥ १६ ॥

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- महाराज पृथु ने जब इस प्रकार कहा, तब उनके वचनामृत का आस्वादन करके सूत आदि गायक लोग बड़े प्रसन्न हुए। फिर वे मुनियों की प्रेरणा से उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे। ‘आप साक्षात् देवप्रवर श्रीनारायण ही हैं’, जो अपनी माया से अवतीर्ण हुए हैं; हम आपकी महिमा का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं। आपने जन्म तो राजा वेन के मृतक शरीर से लिया है, किन्तु आपके पौरुषों का वर्णन करने में साक्षात् ब्रह्मादि की बुद्धि भी चकरा जाती है। तथापि आपके कथामृत के आस्वादन में आदर-बुद्धि रखकर मुनियों के उपदेश के अनुसार उन्हीं की प्रेरणा से हम आपके परम प्रशंसनीय कर्मों का कुछ विस्तार करना चाहते हैं, आप साक्षात् श्रीहरि के कलावतार हैं और आपकी कीर्ति बड़ी उदार है।

‘ये धर्मधारियों में श्रेष्ठ महाराज पृथु लोक को धर्म में प्रवृत्त करके धर्ममर्यादा की रक्षा करेंगे तथा उसके विरोधियों को दण्ड देंगे। ये अकेले ही समय-समय पर प्रजा के पालन, पोषण और अनुरंजन आदि कार्य के अनुसार अपने शरीर में भिन्न-भिन्न लोकपालों की मूर्ति को धारण करेंगे तथा यज्ञ आदि के प्रचार द्वरा स्वर्गलोक और वृष्ठि की व्यवस्था द्वारा भूलोक- दोनों का ही हित साधन करेंगे। ये सूर्य के समान अलौकिक, महिमान्वित, प्रतापवान् और समदर्शी होंगे। जिस प्रकार सूर्य देवता आठ महीने तपते रहकर जल खींचते हैं और वर्षा-ऋतु में उसे उड़ेल देते हैं, उसी प्रकार ये कर आदि के द्वारा कभी धन-संचय करेंगे और कभी उसका प्रजा के हित के लिये व्यय कर डालेंगे। ये बड़े दयालु होंगे। यदि कभी कोई दीनपुरुष इनके मस्तक पर पैर भी रख देगा, तो भी ये पृथ्वी के समान उसके इस अनुचित व्यवहार को सदा सहन करेंगे।

कभी वर्षा न होगी और प्रजा के प्राण संकट में पड़ जायेंगे, तो ये राजवेषधारी श्रीहरि इन्द्र की भाँति जल बरसाकर अनायास ही उसकी रक्षा कर लेंगे। ये अपने अमृतमय मुखचन्द्र की मनोहर मुस्कान और प्रेमभरी चितवन से सम्पूर्ण लोकों को आनन्दमग्न कर देंगे। इनकी गति को कोई समझ न सकेगा, इनके कार्य भी गुप्त होंगे तथा उन्हें सम्पन्न करने का ढंग भी बहुत गम्भीर होगा। इनका धन सदा सुरक्षित रहेगा। ये अनन्त माहात्म्य और गुणों के एकमात्र आश्रय होंगे। इस प्रकार मनस्वी पृथु साक्षात् वरुण के ही समान होंगे।

‘महाराज पृथु वेनरूप अरणि के मन्थन से प्रकट हुए अग्नि के समान हैं। शत्रुओं के लिये ये अत्यन्त दुर्धर्ष और दुःसह होंगे। ये उनके समीप रहने पर भी, सेनादि से सुरक्षित रहने के कारण, बहुत दूर रहने वाले-से होंगे। शत्रु कभी इन्हें हरा न सकेंगे। जिस प्रकार प्राणियों के भीतर रहने वाला प्राणरूप सूत्रात्मा शरीर के भीतर-बाहर के समस्त व्यापारों को देखते रहने पर भी उदासीन रहता है, उसी प्रकार ये गुप्तचरों के द्वारा प्राणियों के गुप्त और प्रकट सभी प्रकार के व्यापार देखते हुए भी अपनी निन्दा और स्तुति आदि के प्रति उदासीनवत् रहेंगे। ये धर्ममार्ग में स्थित रहकर अपने शत्रु के पुत्र को भी, दण्डनीय न होने पर, कोई न दण्ड ने देंगे और दण्डनीय होने पर तो अपने पुत्र को भी दण्ड देंगे। भगवान् सूर्य मानसोत्तर पर्वत तक जितने प्रदेश को अपनी किरणों से प्रकाशित करते हैं, उस सम्पूर्ण क्षेत्र में इनका निष्कण्टक राज्य रहेगा। ये अपने कार्यों से सब लोकों को सुख पहुँचावेंगे- उनका रंजन करेंगे; इससे उन मनोरंजनात्मक व्यापारों के कारण प्रजा इन्हें ‘राजा’ कहेगी। ये बड़े दृशसंकल्प, सत्यप्रतिज्ञ, ब्राह्मण भक्त, वृद्धों की सेवा करने वाले, शरणागतवत्सल, सब प्राणियों को मान देने वाले और दीनों पर दया करने वाले होंगे।

मातृभक्तिः परस्त्रीषु पत्‍न्यामर्ध इवात्मनः ।

प्रजासु पितृवत् स्निग्धः किङ्‌करो ब्रह्मवादिनाम् ॥ १७ ॥

देहिनां आत्मवत्प्रेष्ठः सुहृदां नन्दिवर्धनः ।

मुक्तसङ्‌गप्रसङ्‌गोऽयं दण्डपाणिः असाधुषु ॥ १८ ॥

अयं तु साक्षाद्‍भगवान् त्र्यधीशः

     कूटस्थ आत्मा कलयावतीर्णः ।

यस्मिन् अविद्यारचितं निरर्थकं

     पश्यन्ति नानात्वमपि प्रतीतम् ॥ १९ ॥

अयं भुवो मण्डलमोदयाद्रेः

     गोप्तैकवीरो नरदेवनाथः ।

आस्थाय जैत्रं रथमात्तचापः

     पर्यस्यते दक्षिणतो यथार्कः ॥ २० ॥

अस्मै नृपालाः किल तत्र तत्र

     बलिं हरिष्यन्ति सलोकपालाः ।

मंस्यन्त एषां स्त्रिय आदिराजं

     चक्रायुधं तद्यश उद्धरन्त्यः ॥ २१ ॥

अयं महीं गां दुदुहेऽधिराजः

     प्रजापतिर्वृत्तिकरः प्रजानाम् ।

यो लीलयाद्रीन् स्वशरासकोट्या

     भिन्दन् समां गामकरोद्यथेन्द्रः ॥ २२ ॥

विस्फूर्जयन्नाजगवं धनुः स्वयं

     यदाचरत्क्ष्मामविषह्यमाजौ ।

तदा निलिल्युर्दिशि दिश्यसन्तो

     लाङ्‌गूलमुद्यम्य यथा मृगेन्द्रः ॥ २३ ॥

एषोऽश्वमेधान् शतमाजहार

     सरस्वती प्रादुरभावि यत्र ।

अहारषीद्यस्य हयं पुरन्दरः

     शतक्रतुश्चरमे वर्तमाने ॥ २४ ॥

एष स्वसद्‌मोपवने समेत्य

     सनत्कुमारं भगवन्तमेकम् ।

आराध्य भक्त्यालभतामलं तद्

     ज्ञानं यतो ब्रह्म परं विदन्ति ॥ २५ ॥

(अनुष्टुप्)

तत्र तत्र गिरस्तास्ता इति विश्रुतविक्रमः ।

श्रोष्यत्यात्माश्रिता गाथाः पृथुः पृथुपराक्रमः ॥ २६ ॥

दिशो विजित्याप्रतिरुद्धचक्रः

स्वतेजसोत्पाटितलोकशल्यः ।

सुरासुरेन्द्रैरुपगीयमान

महानुभावो भविता पतिर्भुवः ॥ २७ ॥

ये परस्त्री में माता के समान भक्ति रखेंगे, पत्नी को अपने आधे अंग के समान मानेंगे, प्रजा पर पिता के समान प्रेम रखेंगे और और ब्रह्मवादियों के सेवक होंगे। दूसरे प्राणी इन्हें उतना ही चाहेंगे, जितना अपने शरीर को। ये सुहृदों के आनन्द को बढ़ायेंगे। ये सर्वदा वैराग्यवान् पुरुषों से विशेष प्रेम करेंगे और दुष्टों को दण्डपाणि यमराज के समान सदा दण्ड देने के लिये उद्यत रहेंगे।

‘तीनों गुणों के अधिष्ठाता और निर्विकार साक्षात् श्रीनारायण ने ही इनके रूप में अपने अंश से अवतार लिया है, जिनमें पण्डित लोग अविद्यावश प्रतीत होने वाले इस नानात्व को मिथ्या ही समझते हैं। ये अद्वितीय वीर और एकच्छत्र सम्राट् होकर अकेले ही उदयाचलपर्यन्त समस्त भूमण्डल की रक्षा करेंगे तथा अपने जयशील रथ पर चढ़कर धनुष हाथ में लिये सूर्य के समान सर्वत्र प्रदक्षिणा करेंगे। उस समय जहाँ-तहाँ सभी लोकपाल और पृथ्वीपाल इन्हें भेंटे समर्पण करेंगे, उनकी स्त्रियाँ इनका गुणगान करेंगी और इन आदिराज को साक्षात् श्रीहरि ही समझेंगी।

ये प्रजापालक राजाधिराज होकर प्रजा के जीवन-निर्वाह के लिये गोरूपधारिणी पृथ्वी का दोहन करेंगे और इन्द्र के समान अपने धनुष के कोनों से बातों-की-बात में पर्वतों को तोड़-फोड़कर पृथ्वी को समतल कर देंगे। रणभूमि में कोई भी इनका वेग नहीं सह सकेगा। जिस समय वे जंगल में पूँछ उठाकर विचरते हुए सिंह के समान अपने ‘आजगव’ धनुष का टंकार करते हुए भूमण्डल में विचरेंगे, उस समय सभी दुष्टजन इधर-उधर छिप जायेंगे। ये सरस्वती के उद्गम स्थान पर सौ अश्वमेध यज्ञ करेंगे। तब अन्तिम यज्ञानुष्ठान के समय इन्द्र इनके घोड़े को हरकर ले जायेंगे। अपने महल के बगीचे में इनकी एक बार भगवान् सनत्कुमार से भेंट होगी। अकेले उनकी भक्तिपूर्वक सेवा करके ये उस निर्मल ज्ञान को प्राप्त करेंगे, जिससे परब्रह्म की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार जब इनके पराक्रम जनता के सामने आ जायेंगे, अब ये परमपराक्रमी महाराज जहाँ-तहाँ अपने चरित्र की ही चर्चा सुनेंगे। इनकी आज्ञा का विरोध कोई भी न कर सकेगा तथा ये सारी दिशाओं को जीतकर और अपने तेज से प्रजा के क्लेशरूप काँटे को निकालकर सम्पूर्ण भूमण्डल के शासक होंगे। उस समय देवता और असुर भी इनके विपुल प्रभाव का वर्णन करेंगे’।

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

इस प्रकार श्रीमद्‌भागवत महापुराण का परमहंस संहिता स्कन्ध ४ अध्याय १६ समाप्त हुआ ॥ १६ ॥

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श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १५

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १५            

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १५ "महाराज पृथु का आविर्भाव और राज्याभिषेक"

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १५

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: पंचदश अध्यायः

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श्रीमद्भागवतपुराणम् स्कन्धः ४ अध्यायः १५      

श्रीमद्भागवत महापुराण चौथा स्कन्ध पंद्रहवाँ अध्याय

चतुर्थ स्कन्ध:  श्रीमद्भागवत महापुराण                       

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १५ श्लोक का हिन्दी अनुवाद सहित

मैत्रेय उवाच -

(अनुष्टुप्)

अथ तस्य पुनर्विप्रैः अपुत्रस्य महीपतेः ।

बाहुभ्यां मथ्यमानाभ्यां मिथुनं समपद्यत ॥ १ ॥

तद् दृष्ट्वा मिथुनं जातं ऋषयो ब्रह्मवादिनः ।

ऊचुः परमसन्तुष्टा विदित्वा भगवत्कलाम् ॥ २ ॥

ऋषय ऊचुः -

एष विष्णोर्भगवतः कला भुवनपालिनी ।

इयं च लक्ष्म्याः सम्भूतिः पुरुषस्यानपायिनी ॥ ३ ॥

अयं तु प्रथमो राज्ञां पुमान् प्रथयिता यशः ।

पृथुर्नाम महाराजो भविष्यति पृथुश्रवाः ॥ ४ ॥

इयं च सुदती देवी गुणभूषणभूषणा ।

अर्चिर्नाम वरारोहा पृथुमेवावरुन्धती ॥ ५ ॥

एष साक्षात् हरेरंशो जातो लोकरिरक्षया ।

इयं च तत्परा हि श्रीः अनुजज्ञेऽनपायिनी ॥ ६ ॥

मैत्रेय उवाच -

प्रशंसन्ति स्म तं विप्रा गन्धर्वप्रवरा जगुः ।

मुमुचुः सुमनोधाराः सिद्धा नृत्यन्ति स्वःस्त्रियः ॥ ७ ॥

शङ्‌खतूर्यमृदङ्‌गाद्या नेदुर्दुन्दुभयो दिवि ।

तत्र सर्व उपाजग्मुः देवर्षिपितॄणां गणाः ॥ ८ ॥

ब्रह्मा जगद्‍गुरुर्देवैः सहासृत्य सुरेश्वरैः ।

वैन्यस्य दक्षिणे हस्ते दृष्ट्वा चिह्नं गदाभृतः ॥ ९ ॥

पादयोः अरविन्दं च तं वै मेने हरेः कलाम् ।

यस्याप्रतिहतं चक्रं अंशः स परमेष्ठिनः ॥ १० ॥

तस्याभिषेक आरब्धो ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादिभिः ।

आभिषेचनिकान्यस्मै आजह्रुः सर्वतो जनाः ॥ ११ ॥

सरित्समुद्रा गिरयो नागा गावः खगा मृगाः ।

द्यौः क्षितिः सर्वभूतानि समाजह्रुरुपायनम् ॥ १२ ॥

सोऽभिषिक्तो महाराजः सुवासाः साध्वलङ्‌कृतः ।

पत्‍न्यार्चिषालङ्‌कृतया विरेजेऽग्निरिवापरः ॥ १३ ॥

तस्मै जहार धनदो हैमं वीर वरासनम् ।

वरुणः सलिलस्रावं आतपत्रं शशिप्रभम् ॥ १४ ॥

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- विदुर जी! इसके बाद ब्राह्मणों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मन्थन किया, तब उनसे एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। ब्रह्मवादी ऋषि उस जोड़े को उत्पन्न हुआ देख और उसे भगवान् का अंश जान बहुत प्रसन्न हुए और बोले।

ऋषियों ने कहा ;- यह पुरुष भगवान् विष्णु की विश्वपालिनी कला से प्रकट हुआ है और वह स्त्री उन परमपुरुष की अनपायिनी (कभी अलग न होने वाली) शक्ति लक्ष्मी जी का अवतार है। इनमें से जो पुरुष है, वह अपने सुयश का प्रथन-विस्तार करने के कारण परमयशस्वी ‘पृथु’ नामक सम्राट् होगा। राजाओं में यही सबसे पहला होगा। यह सुन्दर दाँतों वाली एवं गुण और आभूषणों को भी विभूषित करने वाली सुन्दरी इन पृथु को ही अपना पति बनायेगी। इसका नाम अर्चि होगा। पृथु के रूप में साक्षात् श्रीहरि के अंश ने ही संसार की रक्षा के लिये अवतार लिया है और अर्चि के रूप में, निरन्तर भगवान् की सेवा में रहने वाली उनकी नित्य सहचरी श्रीलक्ष्मी जी ही प्रकट हुई हैं।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- विदुर जी! उस समय ब्राह्मण लोग पृथु की स्तुति करने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्वों ने गुणगान किया, सिद्धों ने पुष्पों की वर्षा की, अप्सराएँ नाचने लगीं। आकाश में शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे। समस्त देवता, ऋषि और पितर अपने-अपने लोकों से वहाँ आये। जगद्गुरु ब्रह्मा जी देवता और देवेश्वरों के साथ पधारे। उन्होंने वेनकुमार पृथु के दाहिने हाथ में भगवान् विष्णु की हस्तरेखाएँ और चरणों में कमल का चिह्न देखकर उन्हें श्रीहरि का ही अंश समझा; क्योंकि जिसके हाथ में दूसरी रेखाओं से बिना कटा हुआ चक्र का चिह्न होता है, वह भगवान् का ही अंश होता है।

वेदवादी ब्राह्मणों ने महाराज पृथु के अभिषेक का आयोजन किया। सब लोग उसकी सामग्री जुटाने में लग गये। उस समय नदी, समुद्र, पर्वत, सर्प, गौ, पक्षी, मृग, स्वर्ग, पृथ्वी तथा अन्य सब प्राणियों ने भी उन्हें तरह-तरह के उपहार भेंट किये। सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से अलंकृत महाराज पृथु का विधिवत् राज्याभिषेक हुआ। उस समय अनेकों अलंकारों से सजी हुई महारानी अर्चि के साथ वे दूसरे अग्निदेव के सदृश जान पड़ते थे।

वीर विदुर जी! उन्हें कुबेर ने बड़ा ही सुन्दर सोने का सिंहासन दिया तथा वरुण ने चन्द्रमा के समान श्वेत और प्रकाशमय छत्र दिया, जिससे निरन्तर जल की फुहियाँ झरती रहती थीं।

वायुश्च वालव्यजने धर्मः कीर्तिमयीं स्रजम् ।

इन्द्रः किरीटमुत्कृष्टं दण्डं संयमनं यमः ॥ १५ ॥

ब्रह्मा ब्रह्ममयं वर्म भारती हारमुत्तमम् ।

हरिः सुदर्शनं चक्रं तत् पत्‍न्यव्याहतां श्रियम् ॥ १६ ॥

दशचन्द्रमसिं रुद्रः शतचन्द्रं तथाम्बिका ।

सोमोऽमृतमयानश्वान् त्वष्टा रूपाश्रयं रथम् ॥ १७ ॥

अग्निराजगवं चापं सूर्यो रश्मिमयानिषून् ।

भूः पादुके योगमय्यौ द्यौः पुष्पावलिमन्वहम् ॥ १८ ॥

नाट्यं सुगीतं वादित्रं अन्तर्धानं च खेचराः ।

ऋषयश्चाशिषः सत्याः समुद्रः शङ्‌खमात्मजम् ॥ १९ ॥

सिन्धवः पर्वता नद्यो रथवीथीर्महात्मनः ।

सूतोऽथ मागधो वन्दी तं स्तोतुमुपतस्थिरे ॥ २० ॥

स्तावकान् तानभिप्रेत्य पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।

मेघनिर्ह्रादया वाचा प्रहसन् इदमब्रवीत् ॥ २१ ॥

पृथुरुवाच -

भोः सूत हे मागध सौम्य वन्दिन्

     लोकेऽधुनास्पष्टगुणस्य मे स्यात् ।

किमाश्रयो मे स्तव एष योज्यतां

     मा मय्यभूवन् वितथा गिरो वः ॥ २२ ॥

तस्मात्परोक्षेऽस्मदुपश्रुतान्यलं

     करिष्यथ स्तोत्रमपीच्यवाचः ।

सत्युत्तमश्लोकगुणानुवादे

     जुगुप्सितं न स्तवयन्ति सभ्याः ॥ २३ ॥

महद्‍गुणानात्मनि कर्तुमीशः

     कः स्तावकैः स्तावयतेऽसतोऽपि ।

तेऽस्याभविष्यन् इति विप्रलब्धो

     जनावहासं कुमतिर्न वेद ॥ २४ ॥

(अनुष्टुप्)               

प्रभवो ह्यात्मनः स्तोत्रं जुगुप्सन्त्यपि विश्रुताः ।

ह्रीमन्तः परमोदाराः पौरुषं वा विगर्हितम् ॥ २५ ॥

वयं तु अविदिता लोके सूताद्यापि वरीमभिः ।

कर्मभिः कथमात्मानं गापयिष्याम बालवत् ॥ २६ ॥

वायु ने दो चँवर, धर्म ने कीर्तिमयी माला, इन्द्र ने मनोहर मुकुट, यम ने दमन करने वाला दण्ड, ब्रह्मा ने वेदमय कवच, सरस्वती ने सुन्दर हार, विष्णु भगवान् ने सुदर्शन चक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मी जी ने अविचल सम्पत्ति, रुद्र ने दस चन्द्राकर चिह्नों से युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिका जी ने सौ चन्द्राकर चिह्नों वाली ढाल, चन्द्रमा ने अमृतमय अश्व, त्वष्टा (विश्वकर्मा) ने सुन्दर रथ, अग्नि ने बकरे और गौ के सींगों का बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्य ने तेजोमय बाण, पृथ्वी ने चरणस्पर्श-मात्र से अभीष्ट स्थान पर पहुँचा देने वाली योगमयी पादुकाएँ, आकाश के अभिमानी द्यौ देवता ने नित्य नूतन पुष्पों की माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादी ने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जाने की शक्तियाँ, ऋषियों ने अमोघ आशीर्वाद, समुद्र ने अपने से उत्पन्न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियों ने उनके रथ के लिये बरोक-टोक मार्ग उपहार में दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करने के लिये उपस्थित हुए। तब उन स्तुति करने वालों का अभिप्राय समझकर वेनपुत्र परमप्रतापी महाराज पृथु ने हँसते हुए मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा।

पृथु ने कहा ;- सौम्य सूत, मागध और वन्दीजन! अभी तो लोक में मेरा कोई भी गुण प्रकट नहीं हुआ। फिर तुम किन गुणों को लेकर मेरी स्तुति करोगे? मेरे विषय में तुम्हारी वाणी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। इसलिये मुझसे भिन्न किसी और की स्तुति करो।

मृदुभाषियों! कालान्तर में जब मेरे अप्रकट गुण प्रकट हो जायें, तब भरपेट अपनी मधुर वाणी से मेरी स्तुति कर लेना। देखो, शिष्टपुरुष पवित्रकीर्ति श्रीहरि के गुणानुवाद के रहते हुए तुच्छ मनुष्यों की स्तुति नहीं किया करते। महान् गुणों को धारण करने में समर्थ होने पर भी ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है, जो उसके न रहने पर भी केवल सम्भावनामात्र से स्तुति करने वालों द्वारा अपनी स्तुति करायेगा? यदि यह विद्याभ्यास करता तो इसमें अमुक-अमुक गुण हो जाते-इस प्रकार की स्तुति से तो मनुष्य की वंचना की जाती है। वह मन्दमति यह नहीं समझता कि इस प्रकार तो लोग उसका उपहास ही कर रहे हैं। जिस प्रकार लज्जाशील उदारपुरुष अपने किसी निन्दित पराक्रम की चर्चा होनी बुरी समझते हैं; उसी प्रकार लोकविख्यात समर्थ पुरुष अपनी स्तुति को भी निन्दित मानते हैं।

सूतगण! अभी हम अपने श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा लोक में अप्रसिद्ध ही हैं; हमने अब तक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है, जिसकी प्रशंसा की जा सके। तब तुम लोगों से बच्चों के समान अपनी कीर्ति का किस प्रकार गान करावें?

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुचरिते पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीमद्‌भागवत महापुराण का परमहंस संहिता स्कन्ध ४ अध्याय १५ समाप्त हुआ ॥ १५ ॥

आगे जारी-पढ़े............... स्कन्ध ४ अध्याय १६