श्रीमद्भागवत माहात्म्यम् – अध्याय १

श्रीमद्भागवत माहात्म्यम् – अध्याय १

श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् का वर्णन स्कन्दपुराण खण्ड- २ (वैष्णवखण्ड)में किया गया है, जो की ४ अध्यायों में है। यहाँ इसका मूलपाठ तथा भावार्थ सहित दिया जा रहा है। श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् – अध्याय १ में परीक्षित् और वज्रनाभ का समागम, शाण्डिल्यमुनि के मुख से भगवान् की लीला के रहस्य और व्रजभूमि के महत्त्व का वर्णन है।  

श्रीमद्भागवत माहात्म्यम् – अध्याय १

श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् – अध्याय १

स्कन्दपुराणम्/खण्डः २ (वैष्णवखण्डः)/भागवतमाहात्म्यम्/अध्यायः ०१

अथ श्रीमद्भागवतमाहात्म्यं प्रारभ्यते ।।

।।ॐ गणेशाय नमः।।

।।ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।।

।। व्यास उवाच ।। 

श्रीसच्चिदानन्दघनस्वरूपिणे कृष्णाय चानन्तसुखाभिवर्षिणे ।।

विश्वोद्भवस्थाननिरोधहेतवे नुमो वयं भक्तिरसाप्तयेऽनिशम् ।। १ ।।

नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम् ।।

कथामृतरसास्वादकुशला ऋषयोऽब्रुवन् ।। २ ।।

।। ऋषय ऊचुः ।। ।।

वज्रं श्रीमाथुरे देशे स्वपौत्रं हस्तिनापुरे ।।

अभिषिच्य गते राज्ञि तौ कथं किं च चक्रतुः ।। ३ ।।

।। सूत उवाच ।। ।।

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।। ४ ।।

महापथं गते राज्ञि परीक्षित्पृथिवीपतिः ।।

जगाम मथुरां विप्रा वज्रनाभदिदृक्षया ।। ५ ।।

पितृव्यमागतं ज्ञात्वा वज्रः प्रेमपरिप्लुतः ।।

अभिगम्याभिवाद्याथ निनाय निजमन्दिरम् ।। ६ ।।

परिष्वज्य स तं वीरः कृष्णैकगतमानसः ।।

रोहिण्याद्या हरेः पत्नीर्ववन्दायतनागतः ।। ७ ।।

ताभिः सम्मानितोऽत्यर्थं परीक्षित्पृथिवीपतिः ।।

विश्रान्तः सुखमासीनो वज्रनाभमुवाच ह ।। ८ ।।

।। श्रीपरीक्षिदुवाच ।। ।।

तात त्वत्पितृभिर्नूनमस्मत्पितृपितामहाः ।।

उद्धृता भूरिदुःखौघादहं च परिरक्षितः ।। ९ ।।

न पारयाम्यहं तात साधु कृत्वोपकारतः।।

त्वामतः प्रार्थयाम्यङ्ग सुखं राज्येऽनुयुज्यताम् ।। 2.6.1.१० ।।

कोशसैन्यादिजा चिन्ता तथारिदमनादिजा ।।

मनागपि न कार्या ते सुसेव्याः किन्तु मातरः ।। ११ ।।

निवेद्य मयि कर्तव्यं सर्वाधिपरिवर्ज्जनम् ।।

श्रुत्वैतत्परमप्रीतो वज्रस्तं प्रत्युवाच ह ।। १२ ।।

।। श्रीवज्रनाभ उवाच ।। ।।

राजन्नुचितमेतत्ते यदस्मासु प्रभाषते ।।

त्वत्पित्रोपकृतश्चाहं धनुर्विद्याप्रदानतः ।। १३ ।।

तस्मान्नाल्पापि मे चिन्ता क्षात्रं दृढमुपेयुषः ।।

किन्त्वेका परमा चिन्ता तत्र किञ्चिद्विचार्य्यताम् ।। १४ ।।

माथुरे त्वभिषिक्तोऽपि स्थितोऽहं निर्जने वने ।।

क्व गता वै प्रजाऽत्रत्या यत्र राज्यं प्ररोचते ।। १५ ।।

इत्युक्तो विष्णुरातस्तु नन्दादीनां पुरोहितम् ।।

शांडिल्यमाजुहावाशु वज्रसंदेहनुत्तये ।। १६ ।।

अथोटजं विहायाशु शांडिल्यः समुपागतः ।।

पूजितो वज्रनाभेन निषसादासनोत्तमे ।। १७ ।।

उपोद्घातं विष्णुरातश्चकाराशु ततस्त्वसौ ।।

उवाच परमप्रीतस्तावुभौ परिसान्त्वयन् ।। १८ ।।

।। श्रीशांडिल्य उवाच ।। ।।

शृणुतं दत्तचित्तौ मे रहस्यं व्रजभूमिजम् ।।

व्रजनं व्याप्तिरित्युक्त्या व्यापनाद्व्रज उच्यते ।। १९ ।।

गुणातीतं परं ब्रह्म व्यापकं व्रज उच्यते ।।

सदानन्दं परं ज्योतिर्मुक्तानां पदमव्ययम् ।। 2.6.1.२० ।।

तस्मिन्नन्दात्मजः कृष्णः सदानन्दांगविग्रहः ।।

आत्मारामश्चाप्तकामः प्रेमाक्तैरनुभूयते ।। २१ ।।

आत्मा तु राधिका तस्य तयैव रमणादसौ ।।

आत्मारामतया प्राज्ञैः प्रोच्यते गूढवेदिभिः ।। २२ ।।

कामास्तु वाञ्छितास्तस्य गावो गोपाश्च गोपिकाः ।।

नित्याः सर्वे विहाराद्या आप्तकामस्ततस्त्वयम् ।। २३ ।।

रहस्यं त्विदमेतस्य प्रकृतेः परमुच्यते ।।

प्रकृत्या खेलतस्तस्य लीलाऽन्यैरनुभूयते ।। २४ ।।

सर्गस्थित्यप्यया यत्र रजःसत्त्वतमोगुणैः ।।

लीलैवं द्विविधा तस्य वास्तवी व्यावहारिकी ।। २५ ।।

वास्तवी तत्स्वसंवेद्या जीवानां व्यावहारिकी ।।

आद्यां विना द्वितीया न द्वितीया नाद्यगा क्वचित् ।। २६ ।।

आवयोर्गोचरेयं तु तल्लीला व्यावहारिकी ।।

यत्र भूरादयो लोका भुवि माथुरमण्डलम् ।। २७ ।।

अत्रैव व्रजभूमिः सा यत्र तत्त्वं सुगोपितम् ।।

भासते प्रेमपूर्णानां कदाचिदपि सर्वतः ।। ।। २८ ।।

कदाचिद्द्वापरस्यान्ते रहोलीलाधिकारिणः ।।

समवेता यदाऽत्र स्युर्यथेदानीं तदा हरिः ।। २९ ।।

स्वैः सहावतरेत्स्वेषु समावेशार्थमीप्सिताः ।।

तदा देवादयोऽप्यन्येऽवतरन्ति समन्ततः ।। 2.6.1.३० ।।

सर्वेषां वाञ्छितं कृत्वा हरिरन्तर्हितोऽभवत् ।।

तेनात्र त्रिविधा लोकाः स्थिताः पूर्वं न संशयः ।। ३१ ।।

नित्यास्तल्लिप्सवश्चैव देवाद्याश्चेति भेदतः ।।

देवाद्यास्तेषु कृष्णेन द्वारिकां प्रापिताः पुरा ।। ३२ ।।

पुनर्मौशलमार्गेण स्वाधिकारेषु चापिताः ।।

तल्लिप्सूंश्च सदा कृष्णः प्रेमानन्दैकरूपिणः ।। ३३ ।।

विधाय स्वीयनित्येषु समावेशितवांस्तदा ।।

नित्याः सर्वेऽप्ययोग्येषु दर्शनाभावतां गताः ।। ३४ ।।

व्यावहारिकलीलास्थास्तत्र यन्नाधिकारिणः ।।

पश्यन्त्यत्रागतास्तस्मान्निर्ज्जनत्वं समन्ततः ।। ३५ ।।

तस्माच्चिन्ता न ते कार्या वज्रनाभ मदाज्ञया ।।

वासयात्र बहून्ग्रामान्संसिद्धिस्ते भविष्यति ।। ३६ ।।

कृष्णलीलानुसारेण कृत्वा नामानि सर्वतः ।।

त्वया वासय ता ग्रामान्संसेव्या भूरियं परा ।। ३७ ।।

गोवर्द्धने दीर्घपुरे मथुरायां महावने ।।

नन्दिग्रामे बृहत्सानौ कार्या राज्यस्थितिस्त्वया ।। ३८ ।।

नद्यद्रिद्रोणिकुण्डादिकुञ्जान्संसेवतस्तव ।।

राज्ये प्रजाः सुसंपन्नास्त्वं च प्रीतो भविष्यसि ।। ३९ ।।

सच्चिदानन्दभूरेषा त्वया सेव्या प्रयत्नतः ।।

तव कृष्णस्थलान्यत्र स्फुरन्तु मदनुग्रहात् ।। 2.6.1.४० ।।

वज्र संसेवनादस्या उद्धवस्त्वां मिलिष्यति ।।

ततो रहस्यमेतस्मात्प्राप्स्यसि त्वं समातृकः ।।४१।।

एवमुक्त्वा तु शाण्डिल्यो गतः कृष्णमनुस्मरन् ।।

विष्णुरातोऽथ वज्रश्च परां प्रीतिमवापतुः ।। ४२ ।।

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां द्वितीये वैष्णवखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये शाडिल्योपदिष्टव्रजभूमिमाहात्म्यवर्णनंनाम प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।

श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम् – अध्याय १ भावार्थ

पहला अध्याय

महर्षि व्यास कहते हैं — जिनका स्वरूप है सच्चिदानन्दघन, जो अपने सौन्दर्य और माधुर्यादि गुणों से सबका मन अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं और सदा-सर्वदा अनन्त सुख की वर्षा करते रहते हैं, जिनकी ही शक्ति से इस विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं — उन भगवान् श्रीकृष्ण को हम भक्तिरस का आस्वादन करने के लिये नित्य-निरन्तर प्रणाम करते हैं ॥ १ ॥

नैमिषारण्यक्षेत्र में श्रीसूतजी स्वस्थ चित्त से अपने आसन पर बैठे हुए थे । उस समय भगवान् की अमृतमय लीलाकथा के रसिक, उसके रसास्वादन में अत्यन्त कुशल शौनकादि ऋषियों ने सूतजी को प्रणाम करके उनसे यह प्रश्न किया ॥ २ ॥

ऋषियों ने पूछा — सूतजी ! धर्मराज युधिष्ठिर जब श्रीमथुरामण्डल में अनिरुनन्दन वज्र का और हस्तिनापुर में अपने पौत्र परीक्षित् का राज्याभिषेक करके हिमालय पर चले गये, तब राजा वज्र और परीक्षित् ने कैसे-कैसे कौन-कौन-सा कार्य किया ॥ ३ ॥

सूतजी ने कहा — भगवान् नारायण, नरोत्तम नर, देवी सरस्वती और महर्षि व्यास को नमस्कार करके शुद्धचित्त होकर भगवतत्त्व को प्रकाशित करनेवाले इतिहासपुराणरूप ‘जय’ का उच्चारण करना चाहिये ॥ ४ ॥

शौनकादि ब्रह्मर्षियो ! जब धर्मराज युधिष्ठिर आदि पाण्डवगण स्वर्गारोहण के लिये हिमालय चले गये, तब सम्राट् परीक्षित् एक दिन मथुरा गये । उनकी इस यात्रा का उद्देश्य इतना ही था कि वहाँ चलकर वज्रनाभ से मिल-जुल आयें ॥ ५ ॥

जब वज्रनाभ को यह समाचार मालूम हुआ कि मेरे पितातुल्य परीक्षित् मुझसे मिलने के लिये आ रहे हैं, तब उनका हृदय प्रेम से भर गया । उन्होंने नगर से आगे बढ़कर उनकी अगवानी की, चरणों में प्रणाम किया और बड़े प्रेम से उन्हें अपने महल में ले आये ॥ ६ ॥

वीर परीक्षित् भगवान् श्रीकृष्ण परम प्रेमी भक्त थे । उनका मन नित्य-निरन्तर आनन्दघन श्रीकृष्णचन्द्र में ही रमता रहता था । उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ का बड़े प्रेम से आलिङ्गन किया । इसके बाद अन्तःपुर में जाकर भगवान् श्रीकृष्ण की रोहिणी आदि पत्नियों को नमस्कार किया ॥ ७ ॥

रोहिणी आदि श्रीकृष्ण-पत्नियों ने भी सम्राट् परीक्षित् का अत्यन्त सम्मान किया । वे विश्राम करके जब आराम से बैठ गये, तब उन्होंने वज्रनाभ से यह बात कही ॥ ८ ॥

राजा परीक्षित् ने कहा — ‘हे तात ! तुम्हारे पिता और पितामहों ने मेरे पिता-पितामह को बड़े-बड़े सङ्कटों से बचाया हैं । मेरी रक्षा भी उन्होंने ही की है ॥ ९ ॥

प्रिय वज्रनाभ ! यदि मैं उनके उपकारों का बदला चुकाना चाहूँ तो किसी प्रकार नहीं चुका सकता । इसलिये मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि तुम सुखपूर्वक अपने राजकाज में लगे रहो ॥ १० ॥

तुम्हें अपने खजाने की, सेना की तथा शत्रुओं को दबाने आदि की तनिक भी चिन्ता न करनी चाहिये । तुम्हारे लिये कोई कर्तव्य है तो केवल एक ही; वह यह कि तुम्हें अपनी इन माताओं की खूब प्रेम से भली-भाँति सेवा करते रहना चाहिये ॥ १५ ॥

यदि कभी तुम्हारे ऊपर कोई आपत्ति-विपत्ति आये अथवा किसी कारणवश तुम्हारे हृदय में अधिक क्लेश का अनुभव हो, तो मुझसे बताकर निश्चित हो जाना; मैं तुम्हारी सारी चिन्ताएँ दूर कर दूँगा ।’ सम्राट् परीक्षित् की यह बात सुनकर वज्रनाभ को बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने राजा परीक्षित् से कहा — ॥ १२ ॥

वज्रनाभ ने कहा — ‘महाराज! आप मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, वह सर्वथा आपके अनुरूप हैं । आपके पिता ने भी मुझे धनुर्वेद की शिक्षा देकर मेरा महान् उपकार किया है ॥ १३ ॥

इसलिये मुझे किसी बात की तनिक भी चिन्ता नहीं है, क्योंकि उनकी कृपा से मैं क्षत्रियोचित शूरवीरता से भली-भाँति सम्पन्न हूँ । मुझे केवल एक बात की बहुत बड़ी चिन्ता है, आप उसके सम्बन्ध में कुछ विचार कीजिये ॥ १४ ॥

यद्यपि मैं मथुरामण्डल के राज्य पर अभिषिक्त हूँ, तथापि मैं यहाँ निर्जन वन में ही रहता हूँ । इस बात का मुझे कुछ भी पता नहीं है कि यहाँ की प्रजा कहाँ चली गयी; क्योंकि राज्य का सुख तो तभी हैं, जब प्रजा रहे ॥ १५ ॥

जब वज्रनाभ ने परीक्षित् से यह बात कही, तब उन्होंने वज्रनाभ का सन्देह मिटाने के लिये महर्षि शाण्डिल्य को बुलवाया । ये ही महर्षि शाण्डिल्य पहले नन्द आदि गोपों के पुरोहित थे ॥ १६ ॥

परीक्षित् का सन्देश पाते ही महर्षि शाण्डिल्य अपनी कुटी छोड़कर वहाँ आ पहुँचे । वज्रनाभ ने विधिपूर्वक उनका स्वागत-सत्कार किया और वे एक ऊँचे आसन पर विराजमान हुए ॥ १७ ॥

राजा परीक्षित् ने वज्रनाभ की बात उन्हें कह सुनायी । इसके बाद महर्षि शाण्डिल्य बड़ी प्रसन्नता से उनको सान्त्वना देते हुए कहने लगे —॥ १८ ॥           

शाण्डिल्यजी ने कहा — ‘प्रिय परीक्षित् और वज्रनाभ ! मैं तुमलोगों से व्रजभूमि का रहस्य बतलाता हूँ । तुम दत्तचित होकर सुनो । ‘व्रज’ शब्द का अर्थ है व्याप्ति । इस वृद्धवचन के अनुसार व्यापक होने के कारण ही इस भूमि का नाम ‘व्रज’ पड़ा है ॥ १९ ॥

सत्त्व, रज, तम — इन तीन गुणों से अतीत जो परब्रह्म है, वही व्यापक हैं । इसलिये उसे ‘व्रज’ कहते हैं । वह सदानन्दस्वरूप, परम ज्योतिर्मय और अविनाशी हैं । जीवन्मुक्त पुरुष उसी में स्थित रहते हैं ॥ २० ॥

इस परब्रह्मस्वरूप व्रजधाम में नन्दनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण का निवास है । उनका एक-एक अंग सच्चिदानन्दस्वरूप हैं । वे आत्माराम और आप्तकाम है । प्रेमरस में डूबे हुए रसिकजन ही उनका अनुभव करते हैं ॥ २१ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण की आत्मा हैं — राधिका; उनसे रमण करने के कारण ही रहस्य-रस के मर्मज्ञ ज्ञानी पुरूष उन्हें ‘आत्माराम’ कहते हैं ॥ २२ ॥

‘काम’ शब्द का अर्थ है कामना — अभिलाषा । व्रज में भगवान् श्रीकृष्ण के वाञ्छित पदार्थ हैं — गौएँ, ग्वालबाल, गोपियाँ और उनके साथ लीला-विहार आदि; वे सब-के-सब यहाँ नित्य प्राप्त हैं । इसी से श्रीकृष्ण को ‘आप्तकाम’ कहा गया हैं ॥ २३ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण की यह रहस्य-लीला प्रकृति से परे हैं । वे जिस समय प्रकृति के साथ खेलने लगते हैं, उस समय दूसरे लोग भी उनकी लीला का अनुभव करते हैं ॥ २४ ॥

प्रकृति के साथ होनेवाली लीला में ही रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण के द्वारा सृष्टि, स्थिति और प्रलय की प्रतीति होती है । इस प्रकार यह निश्चय होता है कि भगवान् की लीला दो प्रकार की है — एक वास्तवी और दूसरी व्यावहारिकी ॥ २५ ॥

वास्तवी लीला स्वसंवेद्य है — उसे स्वयं भगवान् और उनके रसिक भक्तजन ही जानते हैं । जीवों के सामने जो लीला होती हैं, वह व्यावहारिकी लीला हैं । वास्तवी लीला के बिना व्यावहारिकी लीला नहीं हो सकती; परन्तु व्यावहारिकी लीला का वास्तविक लीला के राज्य में कभी प्रवेश नहीं हो सकता ॥ २६ ॥

तुम दोनों भगवान् की जिस लीला को देख रहे हो, यह व्यावहारिकी लीला है । यह पृथ्वी और स्वर्ग आदि लोक इसी लीला के अन्तर्गत हैं । इसी पृथ्वी पर यह मथुरामण्डल है ॥ २५ ॥

यही वह व्रजभूमि हैं, जिसमें भगवान् की वह वास्तवी रहस्य-लीला गुप्तरूप से होती रहती हैं । वह कभी-कभी प्रेमपूर्ण हृदयवाले रसिक भक्तों को सब ओर दीखने लगती हैं ॥ २८ ॥

कभी अट्ठाईसवें द्वापर के अन्त में जब भगवान् की रहस्य-लीला के अधिकारी भक्तजन यहाँ एकत्र होते हैं, जैसा कि इस समय भी कुछ काल पहले हुए थे, उस समय भगवान् अपने अन्तरङ्ग प्रेमियों के साथ अवतार लेते हैं । उनके अवतार का यह प्रयोजन होता हैं कि रहस्य-लीला के अधिकारी भक्तजन भी अन्तरङ्ग परिकरों के साथ सम्मिलित होकर लीला-रस का आस्वादन कर सकें । इस प्रकार जब भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं, उस समय भगवान् के अभिमत प्रेमी देवता और ऋषि आदि भी सब ओर अवतार लेते हैं ॥ २१-३० ॥

अभी-अभी जो अवतार हुआ था, उसमें भगवान् अपने सभी प्रेमियों की अभिलाषाएँ पूर्ण करके अब अन्तर्धान हो चुके हैं । इससे यह निश्चय हुआ कि यहाँ पहले तीन प्रकार के भक्तजन उपस्थित थे । इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३१ ॥

उन तीनों में प्रथम तो उनकी श्रेणी है, जो भगवान् के नित्य ‘अन्तरङ्ग’ पार्षद हैं — जिनको भगवान् से कभी वियोग होता ही नहीं । दूसरे वे हैं, जो एकमात्र भगवान् को पाने की इच्छा रखते हैं — उनकी अन्तरङ्गलीला में अपना प्रवेश चाहते हैं । तीसरी श्रेणी में देवता आदि हैं । इनमें से जो देवता आदि के अंश से अवतीर्ण हुए थे, उन्हें भगवान् ने व्रजभूमि से हटाकर पहले ही द्वारका पहुँचा दिया था ॥ ३२ ॥

फिर भगवान् ने ब्राह्मण के शाप से उत्पन्न मूसल को निमित्त बनाकर यदुकुल में अवतीर्ण देवताओं को स्वर्ग में भेज दिया और पुनः अपने-अपने अधिकार पर स्थापित कर दिया तथा जिन्हें एकमात्र भगवान् को ही पाने की इच्छा थी, उन्हें प्रेमानन्दस्वरूप बनाकर श्रीकृष्ण ने सदा के लिये अपने नित्य अन्तरङ्ग पार्षदों में सम्मिलित कर लिया । जो नित्य पार्षद हैं, वे यद्यपि यहाँ गुप्तरूप से होनेवाली नित्यलीला में सदा ही रहते हैं, परन्तु जो उनके दर्शन के अधिकारी नहीं हैं, ऐसे पुरुषों के लिये वे भी अदृश्य हो गये हैं ॥ ३३-३४ ॥

जो लोग व्यावहारिक लीला में स्थित हैं, वे नित्यलीला का दर्शन पाने के अधिकारी नहीं हैं, इसलिये यहाँ आनेवालों को सब ओर निर्जन वन — सूना-ही-सूना दिखायी देता हैं; क्योंकि वे वास्तविक लीला में स्थित भक्तजन को देख नहीं सकते ॥ ३५ ॥

इसलिये वज्रनाभ ! तुम्हें तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये । तुम मेरी आज्ञा से यहाँ बहुत-से गाँव बसाओ; इससे निश्चय ही तुम्हारे मनोरथों की सिद्धि होगी ॥ ३६ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण ने जहाँ जैसी लीला की है, उसके अनुसार उस स्थान का नाम रखकर तुम अनेकों गाँव बसाओ और इस प्रकार दिव्य व्रजभूमि का भली-भाँति सेवन करते रहो ॥ ३७ ॥

गोवर्धन, दीर्घपुर (डीग), मथुरा, महावन (गोकुल), नन्दिग्राम (नन्दगाँव) और बृहत्सानु (बरसाना) आदि में तुम्हें अपने लिये छावनी बनवानी चाहिये ॥ ३८ ॥

उन-उन स्थानों में रहकर भगवान् की लीला के स्थल नदी, पर्वत, घाटी, सरोवर और कुण्ड तथा कुञ्ज-वन आदि का सेवन करते रहना चाहिये । ऐसा करने से तुम्हारे राज्य में प्रजा बहुत ही सम्पन्न होगी और तुम भी अत्यन्त प्रसन्न रहोगे ॥ ३९ ॥

यह व्रजभूमि सच्चिदानन्दमयी है, अतः तुम्हें प्रयत्नपूर्वक इस भूमि का सेवन करना चाहिये । मैं आशीर्वाद देता हूँ, मेरी कृपा से भगवान् की लीला के जितने भी स्थल हैं, सबकी तुम्हें ठीक-ठीक पहचान हो जायगी ॥ ४० ॥

वज्रनाभ ! इस व्रजभूमि का सेवन करते रहने से तुम्हें किसी दिन उद्धवजी मिल जायेंगे । फिर तो अपनी माताओं सहित तुम उन्हीं से इस भूमि का तथा भगवान् की लीला का रहस्य भी जान लोगे ॥ ४१ ॥

मुनिवर शाण्डिल्यजी उन दोनों को इस प्रकार समझा-बुझाकर भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए अपने आश्रम पर चले गये । उनकी बातें सुनकर राजा परीक्षित् और वज्रनाभ दोनों ही बहुत प्रसन्न हुए ॥ ४२ ॥

॥ श्रीस्कान्दे महापुराणे एकाशीतिसाहस्र्यां संहिताया द्वितीये वैष्णवखण्डे श्रीमद्‌भागवतमाहात्म्ये शाण्डिल्योपदिष्टव्रजभूमिमाहात्म्यवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ 

आगे ............

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय ३

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय ३ 

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय ३ गर्भाधान से यज्ञोपवीत पर्यन्त संस्कारों की संक्षिप्त विधि, अन्न-प्रशंसा तथा भोजन-विधि के प्रसंग में धनवर्धन की कथा, हाथों के तीर्थ एवं आचमन-विधि। यहाँ भविष्यपुराण की मूलपाठ तत्पश्चात् कथा हिन्दी भावार्थ सहित पाठकों के लाभार्थ दिया जा रहा है ।

भविष्यपुराणम् /पर्व १ (ब्राह्मपर्व)/अध्यायः ३

भविष्यपुराणम् /पर्व १ (ब्राह्मपर्व)/अध्यायः ३

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय ३ 

भविष्यपुराणम् /पर्व १ (ब्राह्मपर्व)/अध्यायः ३

ॐ श्रीपरमात्मने नम:

॥ श्रीगणेशाय नम ॥

॥ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अथ तृतीयोऽध्यायः

गर्भाधानादारभ्य समासात्सर्वसंस्कारवर्णनमाचमनादिविधिवर्णनञ्च

शतानीक उवाच

जातकर्मादिसंस्कारान्वर्णानामनुपूर्वशः ।

आश्रमाणां च मे धर्मं कथयस्व द्विजोत्तम । । १

सुमन्तुरुवाच

गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तोन्नयनं तथा ।

जातकर्मान्नप्राशश्च चूडामौञ्जीनिबन्धनम् । । २

बैजिकं गार्भिकं चैनो द्विजानामपमृज्यते ।

स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया श्रुतैः । । ३

महायज्ञैश्च ब्राह्मीयं यज्ञैश्च क्रियते तनुः ।

शृणुष्वैकमना राजन्यथा सा क्रियते तनुः । । ४

प्राङ्नाभिकर्तनात्पुंसो जातकर्म विधीयते ।

मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्यमधुसर्पिषाम् । । ५

नामधेयं दशम्यां तु केचिदिच्छन्ति पार्थिव ।

द्वादश्यामपरे राजन्मासि पूर्णे तथा परे । । ६

अष्टादशेऽहनि तथाऽन्ये वदन्ति मनीषिणः ।

पुण्ये तिथौ मुहूर्ते च नक्षत्रे च गुणान्विते । । ७

मङ्गल्यं तात विप्रस्य शिवशर्मेति पार्थिव ।

राजन्यस्य विशिष्टं १ तु इन्दुवर्मेति कथ्यते २ । ।। ८ ।।

वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य च जुगुप्सितम् ।

धनवर्धनेति वैश्यस्य सर्वदासेति हीनजे । । ९

मनुना च तथा प्रोक्तं नाम्नो लक्षणमुत्तमम् ।

शर्मवद्ब्राह्मणस्य स्याद्राज्ञो रक्षासमन्वितम् । । 1.3.१०

वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्यसंयुतम् ।

स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं विस्पष्टार्थमनोरमम् । । ११

मङ्गल्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत् ।

द्वादशेऽहनि राजेन्द्र शिशोर्निष्कमणं गृहात् । । १२

चतुर्थे मासि कर्त्तव्यं तथान्येषां मतं विभो ।

षष्ठेऽन्नप्राशनं मासि यथेष्टं मङ्गलं कुले । । १३

चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामनुपूर्वशः ।

प्रथमेऽब्दे तृतीये वा कर्तव्यं कुरुनन्दन । । १४

गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम् ।

गर्भादेकादशे राजन्क्षत्रियस्य विनिर्दिशेत् । । १५

द्वादशेऽब्देऽपि गर्भात्तु वैश्यस्य व्रतमादिशेत् ।

ब्रह्मवर्चसकामेन कार्यं विप्रस्य पञ्चमे । । १६

बलार्थिना तथा राज्ञः षष्ठे ऽब्दे कार्यमेव हि ।

अर्थकामेन वैश्यस्य अष्टमे कुरुनन्दन । । १७

आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते ।

द्वाविंशतेः क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः । । १८

अत ऊर्ध्वं तु ये राजन्यथाकालमसंस्कृताः ।

सावित्रीपतिता व्रात्या व्रात्यस्तोमादृते ३ क्रतोः । । १९

न चाप्येभिरपूतैस्तु आपद्यपि हि कर्हिचित् ।

ब्राह्मं यौनं च सम्बन्धमाचरेद्ब्राह्मणैः सह । । 1.3.२०

भवन्ति राजंश्चर्माणि व्रतिनां त्रिविधानि च ।

कार्ष्णरौरववास्तानि ब्रह्मक्षत्रविशां नृप । । २१

वशीरंश्चानुपूर्व्येण वस्त्राणि विविधानि तु ।

ब्रह्मक्षत्रविशो राजञ्छाणक्षौमादिकानि च । । २२

मौञ्जी त्रिवृत्समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला ।

क्षत्रियस्य च मौर्वीज्या वैश्यस्य शणतान्तवी । । २३

मुञ्जालाभे तु कर्तव्या कुशाश्मन्तकबल्वजैः ।

त्रिवृत्ता ग्रन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चभिरेव च । । २४

कार्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत् ।

शणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसौत्रिकम् । । २५

पुष्कराणि तथा चैषां भवन्ति त्रिविधानि तु ।

ब्रह्मणो बैल्वपालाशौ तृतीयं प्लक्षजं नृप । । २६

वाटखादिरौ क्षत्रियस्तु तथान्यं वेतसोद्भवम् ।

पैलवोदुम्बरौ वैश्यस्तथाश्वत्थजमेव हि । । २७

दण्डानेतान्महाबाहो धर्मतोऽर्हन्ति धारितुम् ।

केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणतः । । २८

ललाटसम्मितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ।

ऋजवस्ते तू सर्वे स्युर्ब्राह्मणाः सौम्यदर्शनाः । । २९

अनुद्वेगकरा नॄणां सत्वचो नाग्निदूषिताः ।

प्रगृह्य चेप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम् । । 1.3.३०

सम्यग्गुरुं तथा पूज्य चरेद्भैक्ष्यं यथाविधि ।

भवत्पूर्वं चरेद्भैक्ष्यमुपनीतो द्विजोत्तमः । । ३१

भवन्मध्यं तु राजन्यो वैश्यस्य भवदुत्तरम् ।

मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम् । । ३२

भिक्षेत भैक्ष्यं प्रथमं या चैनं नावमानयेत् ।

सुवर्णं रजतं चान्नं सा पात्रेऽस्य विनिर्दिशेत् । । ३३

समाहृत्य ततो भैक्ष्यं यावदर्थममायया ।

निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः । । ३४

आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः ।

श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं १ भुङ्क्ते उदङ्मुखः । । ३५

उपस्पृश्य द्विजो राजन्नन्नमद्यात्समाहितः ।

भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत् । । ३६

तथान्नं पूजयेन्नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् ।

दर्शनात्तस्य हष्येद्वै प्रसीदेच्चापि भारत। । ३७

अभिनन्द्य ततोऽश्नीयादित्येवं मनुरब्रवीत् ।

पूजितं त्वशनं नित्यं बलमोजश्च यच्छति। । ३८

अपूजितं तु तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम् ६।

नोच्छिष्टं कस्यचिद्दद्यान्नाद्याच्चैतत्तथान्तरा । । ३९

यस्त्वन्नमन्तरा कृत्वा लोभादत्ति नृपोत्तम ।

विनाशं याति स नर इह लोके परत्र च । ।

यथाभवत्पुरा वैश्यो धनवर्द्धनसंज्ञितः । । 1.3.४०

शतानीक उवाच

स कथमन्तरं पूर्वमन्नस्य द्विजसत्तम ।

किमन्तरं तथान्नस्य कथं वा तत्कृतं भवेत् । । ४१

सुमन्तुरुवाच

पुरा कृतयुगे राजन्वैश्यो वसति पुष्करे ।

धनवर्धननामा वै समृद्धौ धनधान्यतः । । ४२

निदाघकाले राजेन्द्र स कृत्वा वैश्वदेविकम् ।

सपुत्रभ्रातृभिः सार्धं तथा वै मित्रबन्धुभिः । ।

आहारं कुरुते राजन्भक्ष्यभोज्यसमन्वितम् १ । । ४३

अथ तद्भुञ्जतस्तस्य २ अन्नं शब्दो महानभूत् ।

करुणः कुरुशार्दूल अथ तं स प्रधावितः । । ४४

त्यक्त्वा स भोजनं यावन्निष्क्रान्तो गृहबाह्यतः ।

अथ शब्दस्तिरोभूतः स भूयो गृहमागतः । । ४५

तमेव भाजनं गृह्य ३ आहारं कृतवान्नृप ।

भुक्तशेषं महाबाहो आहारं स तु भुक्तवान् । । ४६

भुक्त्वा स शतधा जातस्तस्मिन्नेव क्षणे नृप ।

तस्मादन्नं न राजेन्द्र अश्नीयादन्तरा क्वचित् । । ४७

न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद्व्रजेत् ।

रसो भवत्यत्यशनाद्रसाद्रोगः प्रवर्तते । । ४८

स्नानं दानं जपो होमः पितृदेवाभिपूजनम् ।

न भवन्ति रसे जाते नराणां भरतर्षभ । । ४९

अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् ।

अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् । । 1.3.५०

यक्षभूतपिशाचानां रक्षसां च नृपोत्तम ।

४गम्यो भवति वै विप्र उच्छिष्टो नात्र संशयः । । ५१

शुचित्वमाश्रयेत्तस्माच्छुचित्वान्मोदते दिति? ।

सुखेन चेह रमते इतीयं वैदिकी श्रुतिः । । ५२

शतानीक उवाच

शुचितामियात्कथं विप्रः कथं चाशुचितामियात् ।

एतन्मे इहि विप्रेन्द्र कौतुकं परमं मम । । ५३

सुमन्तुरुवाच

उपस्पृश्य शुचिर्विप्रो भवते भरतर्षभ ।

विधिवत्कुरुशार्दूल भवेद्विधिपरो ह्यतः । । ५४

शतानीक उवाच

उपस्पर्शविधिं विप्र कथय त्वं ममाखिलम् ।

शुचित्वमाप्नुयाद्येन आचान्तो ब्राह्मणो द्विजः । । ५५

सुमन्तुरुवाच

साधु पृष्टोऽस्मि राजेन्द्र शृणु विप्रो यथा भवेत् ।

शुचिर्भरतशार्दूल विधिना येन वा विभो । । ५६

प्रक्षाल्य हस्तौ पादौ च प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपि वा ।

उपविश्य शुचौ देशे बाहुं कृत्वा च दक्षिणम् । । ५७

जान्वन्तरे महाबाहो ब्रह्मसूत्रसमन्वितः १ ।

सुसमौ चरणौ कृत्वा तथा बद्धशिखो नृप । । ५८

न तिष्ठन्न च संजल्पंस्तथा चानवलोकयन् ।

न त्वरन्कुपितो वापि त्यक्त्वा राजन्सुदूरतः । । ५९

प्रसन्नाभिस्तथाद्भिस्तु आचान्तः शुचितामियात् ।

नोष्णाभिर्न सफेनाभिर्युक्ताभिः कलुषेण च । । 1.3.६०

वर्णेन रसगन्धाभ्यां हीनाभिर्न च भारत ।

सबुद्बुदाभिश्च तथा नाचामेत्पण्डितो नृप । । ६१

पञ्चतीर्थानि विप्रस्य श्रूयन्ते दक्षिणे करे ।

देवतीर्थं पितृतीर्थं ब्रह्मतीर्थं च मानद । । ६२

प्राजापत्यं तथा चान्यत्तथान्यत्सौम्यमुच्यते ।

अङ्गुष्ठमूलोत्तरतो येयं रेखा महीपते । । ६३

ब्राह्मं तीर्थं वदन्त्येतद्वसिष्ठाद्या द्विजोत्तमाः ।

कायं कनिष्ठिकामूले अङ्गुल्यग्रे तु दैवतम् । । ६४

तर्जन्यङ्गुष्ठयोरन्तः पित्र्यं तीर्थमुदाहृतम् ।

करमध्ये स्थितं सौम्यं प्रशस्तं देवकर्मणि । । ६५

देवार्चाबलिहरणं प्रविक्षपणमेव च ।

एतानि देवतीर्थेन कुर्यात्कुरुकुलोद्वह । । ६६

अन्ननिर्वपणं राजंस्तथा सपवनं १ नृप ।

लाजाहोमं तथा सौम्यं प्राजापत्येन कारयेत् । । ६७

कमण्डलूपस्पर्शनं दधिप्राशनमेव च ।

सौम्यतीर्थेन राजेन्द्र सदा कुर्याद्विचक्षणः । । ६८

पितॄणां तर्पणं कार्यं पितृतीर्थेन धीमता ।

ब्राह्मेण चापि तीर्थेन सदोषस्पर्शनं परम् । । ६९

२घनाङ्गुलिकरं कृत्वा एकाग्रः सुमना द्विजः ।

त्रिः कृत्वा यः पिबेदापो मुखशब्दविवर्जितः । । 1.3.७०

शृणु यत्फलमाप्नोति प्रीणाति च यथा सुरान् ।

प्रथमं यत्पिबेदाप ऋग्वेदस्तेन तृप्यति । । ७१

यद्द्वितीयं यजुर्वेदस्तेन प्रीणाति भारत ।

यत्तृतीयं सामवेदस्तेन प्रीणाति भारत । । ७२

प्रथमं यन्मृजेदास्यं दक्षिणाङ्गुष्ठमूलतः ।

अथर्ववेदः प्रीणाति तेन राजन्नसंशयः । । ७३

इतिहासपुराणानि यद्द्वितीयं प्रमार्जति ।

यन्मूर्धानं हि राजेन्द्र अभिषिञ्चति वै द्विजः । । ७४

तेन प्रीणाति वै रुद्रं शिखामालभ्य वै ऋषीन् ।

यदक्षिणी चालभते रविः प्रीणाति तेन वै । । ७५

नासिकालम्भनाद्वायुं प्रीणात्येव न संशयः ।

यच्छ्रोत्रमालभेद्विप्रो दिशः प्रीणाति तेन वै । । ७६

यमं कुबेरं वरुणं वासवं चाग्निमेव च ।

यद्बाहुमन्वालभते एतान्प्रीणाति तेन १ वै । । ७७

यन्नाभिमन्वालभते प्राणानां ग्रन्थिमेव च ।

तेन प्रीणाति राजेन्द्र इतीयं वैदिकी श्रुतिः । । ७८

अभिषिञ्चति यत्पादौ विष्णुं प्रीणाति तेन वै ।

यद्भूम्याच्छादकं वारि विसर्जयति मानद । । ७९

वासुकिप्रमुखान्नागांस्तेन प्रीणाति भारत ।

यद्बिन्दवोऽन्तरे भूमौ पतन्तीह नराधिप । । 1.3.८०

भूतग्रामं ततस्तस्तु प्रीणन्तीह चतुर्विधम् ।

अङ्गुष्ठेन प्रदेशिन्या लभेत चाक्षिणी नृप । । ८१

अनामिकाङ्गुष्ठिकाभ्यां नासिकामालभेन्नृप ।

मध्यमाङ्गुष्ठाभ्यां मुखं संस्पृशेद्भरतर्षभ । । ८२

कनिष्ठिकाङ्गुष्ठकाभ्यां कर्णमालभते नृप ।

अङ्गुलीभिस्तथा बाहुमङ्गुष्ठेन तु मङ्गलम् । । ८३ 

अङ्गुलयः 

पुराणेषु अङ्गुलिविन्यासः 

सामवेदे अङ्गुलिविन्यासः

नाभिं कुरुकुलश्रेष्ठ शिरः सर्वाभिरेव च ।

[१]अङ्गुष्ठोग्निर्महाबाहो प्रोक्तो वायुः प्रदेशिनी । । ८४

अनामिका तथा सूर्यः कनिष्ठा माघवा विभो ।

प्रजापतिर्मध्यमा ज्ञेया तस्माद्भरतसत्तम । । ८५

एवमाचम्य विप्रस्तु प्रीणाति सततं जगत् ।

सर्वाश्च देवतास्तात लोकांश्चापि न संशयः । । ८६

तस्मात्पूज्यः सदा विप्रः सर्वदेवमयो हि सः ।

ब्राह्मेण विप्रतीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत् । । ८७

कायत्रैदेशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन ।

हृद्गाभिः पूयते विप्रः कण्ठगाभिस्तु भूमिपः । । ८८

वैश्योद्भिः प्राशिताभिस्तु शूद्रः स्पृष्टाभिरन्ततः ।

उद्धृते दक्षिणे पाणावुपवीत्युच्यते बुधः । । ८९

सव्येन प्राचीनावीती निवीती कण्ठसंज्ञिते ।

मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम् । । 1.3.९०

अस्तु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रवित् ।

उपवीत्याचमेन्नित्यमन्तर्जानु महीपते । । ९१

एवं तु विप्रो ह्याचान्तः शुचितां याति भारत ।

यास्त्वेताः करमध्ये तु रेखा विप्रस्य भारत । । ९२

गङ्गाद्याः सरितः सर्वा ज्ञेया भारतसत्तम ।

यान्यङ्गुलिषु पर्वाणि गिरयस्तानि विद्धि वै । । ९३

सर्वदेवमयो राजन्करो विप्रस्य दक्षिणः ।

हस्तोपस्पर्शनविधिस्तवाख्यातो महीपते । । ९४

एषु सर्वेषु लोकेषु येनाचान्तो दिवं व्रजेत् । । ९५

इति श्रीभविष्ये महापुराणे शतार्द्धसाहस्र्यां संहितायां ब्राह्मे पर्वण्युपस्पर्शनविधिवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः । ३ ।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय ३ भावार्थ सहित     

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व

राजा शतानीक ने कहा – हे मुने ! आपने मुझे जातकर्मादि संस्कारों के विषय में बताया, अब आप इन संस्कारों के लक्षण तथा चारों वर्ण एवं आश्रम के धर्म बतलाने की कृपा करें।

सुमन्तु मुनि बोले – राजन् ! गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म तथा यज्ञोपवीत आदि संस्कारों के करने से द्विजातियों के बीज-सम्बन्धी तथा गर्भ-सम्बन्धी सभी दोष निवृत्त हो जाते है। वेदाध्ययन, व्रत, होम, त्रैविद्य व्रत, देवर्षि-पितृ-तर्पण, पुत्रोत्पादन, पञ्च-महायज्ञ और ज्योतिष्टोमादि यज्ञों के द्वारा यह शरीर ब्रह्म-प्राप्ति के योग्य हो जाता है। अब इन संस्कारों की विधि को आप संक्षेप में सुने –

पुरुष का जातकर्म-संस्कार नालच्छेदन से पहिले किया जाता है। इसमें वेद-मंत्रों के उच्चारण-पूर्वक बालक को सुवर्ण, मधु और घृत का प्राशन कराया जाता है। दसवें दिन, बारहवें दिन, अठारहवें दिन अथवा एक मास पूरा होने पर शुभ तिथि मुहूर्त और शुभ नक्षत्र में नामकरण-संस्कार किया जाता है। ब्राह्मण का नाम मंगल-वाचक रखना चाहिये, जैसे शिवशर्मा। क्षत्रिय का बल-वाचक जैसे इंद्रवर्मा। वैश्य का धन-युक्त जैसे धनवर्धन और शुद्र का भी यथाविधि देवदासादि नाम रखना चाहिये। स्त्रियों का नाम ऐसा रखना चाहिये, जिसके बोलने में कष्ट न हो, क्रूर न हो, अर्थ स्पष्ट और अच्छा हो, जिसके सुनने से मन प्रसन्न हो तथा मंगल-सूचक एवं आशीर्वाद-युक्त हो और जिसके अन्त में आकार, ईकार आदि दीर्घ स्वर हो। जैसे यशोदा देवी आदि।

जन्म से बारहवें दिन अथवा चतुर्थ मास में बालक को घर से बाहर निकालना चाहिये, इसे ‘निष्क्रमण’ कहते हैं। छठे मास में बालक का अन्न-प्राशन-संस्कार करना चाहिये। पहले या तीसरे वर्ष में मुण्डन-संस्कार करना चाहिये। गर्भ से आठवे वर्ष में ब्राह्मण का, ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का और बारहवें वर्ष में वैश्य का यज्ञोपवीत-संस्कार करना चाहिये। परंतु ब्रह्मतेज की इच्छा वाला ब्राह्मण पांचवें वर्ष में, बल की इच्छा वाला क्षत्रिय छठे वर्ष में और धन की कामना वाला वैश्य आठवें वर्ष में अपने-अपने बालकों का उपनयन-संस्कार सम्पन्न करे। सोलह वर्ष तक ब्राह्मण, बाईस वर्ष तक क्षत्रिय और चौबीस वर्ष तक वैश्य गायत्री (सावित्री) के अधिकारी रहते हैं, इसके अनन्तर यथा-समय संस्कार न होने से गायत्री के अधिकारी नहीं रहते और ये ‘व्रात्य’ कहलाते हैं। फिर जब तक ‘व्रात्य-स्तोम’ नामक यज्ञ से उनकी शुद्धि नहीं की जाती, तब तक उनका शरीर गायत्री-दीक्षा के योग्य नहीं बनता। इन व्रात्यों के साथ आपत्ति में भी वेदादि शास्त्रों का पठन-पाठन अथवा विवाह आदि का सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये।

त्रैवर्णिक ब्रह्मचारियों को उत्तरीय के रूप में क्रमशः कृष्ण (कस्तुरी)-मृगचर्म, रुरु नामक मृग का चर्म और बकरे का चर्म धारण करना चाहिये। इसी प्रकार क्रमशः सन (टाट), अलसी और भेड़ के ऊन का वस्त्र धारण करना चाहिये। ब्राह्मण ब्रह्मचारी के लिए तीन लड़ीवाली सुन्दर चिकनी मूँज की, क्षत्रिय के लिए मूर्वा (मुरा)- की और वैश्य के लिए सन की मेखला कही गयी है। मूँज आदि के प्राप्त न होने पर क्रमशः कुशा, अश्मन्तक और बल्वज नामक तृण की मेखला को तीन लड़ीवाली करके एक, तीन अथवा पाँच ग्रन्थियाँ उसमे लगानी चाहिये। ब्राह्मण कपास के सूत का, क्षत्रिय सन के सूत का और वैश्य भेड़ के ऊन का यज्ञोपवीत धारण करे। ब्राह्मण बिल्व, पलाश या प्लक्ष का दण्ड, जो सिरपर्यन्त हो उसे धारण करे। क्षत्रिय बड़, खदिर या बेंत के काष्ट का मस्तकपर्यन्त ऊँचा और वैश्य पैलव (पीलू वृक्ष की लकड़ी), गूलर अथवा पीपल के काष्ठ का दण्ड नासिकापर्यन्त ऊँचा धारण करे। ये दण्ड सीधे, छिद्र-रहित और सुंदर होने चाहिये। यज्ञोपवीत-संस्कार में अपना-अपना दण्ड धारणकर भगवान सूर्यनारायण का उपस्थान करे और गुरु की पूजा करे तथा नियम के अनुसार सर्वप्रथम माता, बहिन या मौसी से भिक्षा माँगे। भिक्षा माँगते समय उपनीत ब्राह्मण वटु भिक्षा देनेवाली से ‘भवति ! भिक्षां में देहि’, क्षत्रिय ‘भिक्षां भवति ! में देहि’ तथा वैश्य ‘भिक्षां देहि में भवति !’ – इस प्रकार से ‘भवति’ शब्द का प्रयोग करे। भिक्षा में वे सुवर्ण, चाँदी अथवा अन्न ब्रह्मचारी को दे। इस प्रकार भिक्षा ग्रहणकर ब्रह्मचारी उसे गुरु को निवेदित कर दे और गुरु की आज्ञा पाकर पूर्वाभिमुख हो आचमन कर भोजन करे। पूर्व की और मुख करके भोजन करने से आयु, दक्षिण-मुख करने से यश, पश्चिम-मुख करने से लक्ष्मी और उत्तर-मुख करके भोजन करने से सत्य की अभिवृद्धि होती है। एकाग्रचित्त हो उत्तम अन्न का भोजन करने के अनन्तर आचमन कर अङ्गों (आँख, कान, नाक) का जल से स्पर्श करे। अन्न की नित्य स्तुति करनी चाहिये और अन्न की निन्दा किये बिना भोजन करना चाहिये। उसका दर्शनकर संतुष्ट एवं प्रसन्न होना चाहिये। हर्ष से भोजन करना चाहिये। पूजित अन्न के भोजन से बल और तेज की वृद्धि होती है और निन्दित अन्न के भोजन से बल और तेज दोनों की हानि होती है।

(तथान्नं पूजयेन्नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् । दर्शनात् तस्य हृष्येद् वै प्रसीदेच्चापि भारत ॥ पूजितं त्वशनं नित्यं बलमोजश्च यच्छति ॥ अपूजितं तु तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम्। (ब्राह्मपर्व ३।३७-३९))

इसलिए सर्वदा उत्तम अन्न का भोजन करना चाहिये। उच्छिष्ट ( जूठा ) नहीं खाना चाहिये तथा स्वयं भी किसी का उच्छिष्ट नहीं खाना वाहिये। भोजन करके जिस अन्न को छोड़ दे उसे फिर ग्रहण न करे अर्थात् बार-बार छोड़-छोडकर भोजन न करे, एक बार बैठकर तृप्ति-पूर्वक भोजन कर लेना चाहिये। जो पुरुष बीच-बीच में विच्छेद करके लोभ-वश भोजन करता है, उसके दोनों लोक नष्ट हो जाते हैं, जैसे धनवर्धन वैश्य के हुये थे।

राजा शतानीक ने पूछा – महाराज ! आप धनवर्धन वैश्य की कथा सुनाइये। उसने कैसा भोजन किया और उसका क्या परिणाम हुआ ?

सुमन्तु मुनिने कहा – राजन् ! सत्ययुग की बात है, पुष्कर क्षेत्र में धन-धान्य से सम्पन्न धनवर्धन नामक एक वैश्य रहता था। एक दिन वह ग्रीष्म ऋतू में मध्याह्न के समय वैश्वदेव-कर्म सम्पन्न कर अपने पुत्र, मित्र तथा बन्धु-बान्धवों के साथ भोजन कर रहा था। इतने में ही अकस्मात् उसे बाहर से एक करुण शब्द सुनायी पड़ा। उस शब्द को सुनते ही वह दयावश भोजन को छोडकर बाहर की ओर दौड़ा। किंतु जब तक वह बाहर पहुँचा वह आवाज बंद हो गयी। फिर लौटकर उस वैश्य ने पात्र में जो छोड़ा हुआ भोजन था उसे खा लिया। भोजन करते ही उस वैश्य की मृत्यु हो गयी और इसी अपराध-वश परलोक में भी उसकी दुर्गति हुई। इसलिए छोड़े हुए भोजन को फिर कभी नहीं खाना चाहिये। अधिक भोजन भी नहीं करना चाहिये। इससे शरीर में अत्यधिक रस की उत्पत्ति होती है, जिससे प्रतिश्याय (जुकाम, मन्दाग्नि, ज्वर) आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते है। अजीर्ण हो जाने से स्नान, दान, तप, होम तर्पण, पूजा आदि कोई भी पुण्य कर्म ठीक से सम्पन्न नहीं हो पाते। अति भोजन करने से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं – आयु घटती है, लोक में निन्दा होती है तथा अन्त में सद्गति भी नहीं होती। उच्छिष्ट मुख से कहीं नहीं जाना चाहिये। सदा पवित्रता से रहना चाहिये। पवित्र मनुष्य यहाँ सुख से रहता है और अन्त में स्वर्ग में जाता है।

राजा ने पूछा – मुनीश्वर ! ब्राह्मण किस कर्म के करने से पवित्र होता है ? इसका आप वर्णन करें। सुमन्तु मुनि बोले – राजन् ! जो ब्राह्मण विधि-पूर्वक आचमन करता है, वह पवित्र हो जाता है और सत्कर्मों का अधिकारी हो जाता है। आचमन की विधि यह है कि हाथ-पाँव धोकर पवित्र स्थान में आसन के ऊपर पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके बैठे। दाहिने हाथ को जानू अर्थात घुटने के भीतर रखकर दोनों चरण बराबर रखे तथा शिखा में ग्रन्थि लगाये और फिर उष्णता एवं फेन से रहित शीतल एवं निर्मल जल से आचमन करे। खड़े-खड़े, बात करते, इधर-उधर देखते हुए, शीघ्रता से और क्रोधयुक्त होकर, आचमन न करे।

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय ३

हे राजन् ! ब्राह्मण के दाहिने हाथ में पाँच तीर्थ कहे गये हैं – (१) देवतीर्थ, (२) पितृतीर्थ, (३) ब्राह्मतीर्थ, (४) प्राजापत्यतीर्थ और (५) सौम्यतीर्थ। अब आप इनके लक्षणों को सुने – अँगूठे के मूल में ब्राह्मतीर्थ, कनिष्ठा के मूल में प्राजापत्यतीर्थ, अङ्गुष्ठ के बीच में पितृतीर्थ और हाथ के मध्य-भाग में सौम्यतीर्थ कहा जाता हैं, जो देवकर्म से प्रशस्त माना गया है।

(“अङ्गुष्ठमूलोत्तरतो येयं रेखा महीपते ॥ ब्राह्म तीर्थं वदन्त्येतद्वसिष्ठाद्या द्विजोत्तमाः । कायं कनिष्ठिकामूले अङ्गुल्यग्रे तु दैवतम् ॥ तर्जन्यअङ्गुष्ठयोरन्तः पित्र्यं तीर्थमुदाहृतम् । करमध्ये स्थितं सौम्यं प्रशस्तं देवकर्मणि ॥” (ब्राह्मपर्व ३।६३-६५))

देवार्चा, ब्राह्मण को दक्षिणा आदि कर्म देवतीर्थ से; तर्पण, पिण्डदानादि कर्म पितृतीर्थ से; आचमन ब्राह्मतीर्थ से; विवाह के समय लाजा-होमादि और सोमपान प्राजापत्यतीर्थ से; कमण्डलु-ग्रहण, दधि-प्राशनादि कर्म सौम्यतीर्थ से करे। ब्राह्मतीर्थ से उप-स्पर्शन सदा श्रेष्ठ माना गया है।

अङ्गुलियों को मिलाकर एकाग्रचित्त हो, पवित्र जल से विना शब्द किये तीन बार आचमन करने से महान् फल होता है और देवता प्रसन्न होते हैं। प्रथम आचमन से ऋग्वेद, द्वितीय से यजुर्वेद और तृतीय से सामवेद की तृप्ति होती है तथा आचमन करके जल-युक्त दाहिने अँगूठे से मुख का स्पर्श करने से अथर्ववेद की तृप्ति होती है। ओष्ठ के मार्जन से इतिहास और पुराणों की तृप्ति होती है। मस्तक में अभिषेक करने से भगवान रुद प्रसन्न होते है। शिखा के स्पर्श से ऋषिगण, दोनों आँखों के स्पर्श से सूर्य, नासिका के स्पर्श से वायु, कानों के स्पर्श से दिशाएँ, भुजा के स्पर्श से यम, कुबेर, वरुण, इन्द्र तथा अग्निदेव तृप्त होते हैं। नाभि और प्राणों की ग्रंथियों के स्पर्श करने से सभी तृप्त हो जाते है। पैर धोने से विष्णुभगवान्, भूमि में जल छोड़ने से वासुकि आदि नाग तथा बीच में जो जलबिन्दु गिरते है, उनसे चार प्रकार के भूतग्राम की तृप्ति होती है।

अङ्गुष्ठ और तर्जनी से नेत्र, अङ्गुष्ठ तथा अनामिका से नासिका, अङ्गुष्ठ एवं मध्यमा से मुख, अङ्गुष्ठ और कनिष्ठका से कान, सब अङ्गुलियों से सिर का स्पर्श करना चाहिये। अङ्गुष्ठ अग्निरूप है, तर्जनी वायुरूप, मध्यमा प्रजापति रूप, अनामिका सूर्य रूप और कनिष्ठिका इन्द्र रुप है।

(“अङ्गुष्ठोऽग्निर्महाबाहो प्रोक्तो वायुः प्रदेशिनी ॥ अनामिका तथा सूर्यः कनिष्ठा मघवा विभो । प्रजापतिर्मध्यमा ज्ञेया तस्माद् भरतसत्तम ॥” (ब्राह्मपर्व ३।८४-८५))

इस विधि से ब्राह्मण के आचमन करने पर सम्पूर्ण जगत्, देवता और लोक तृप्त हो जाते हैं। ब्राह्मण सदा पूजनीय है, क्योंकि वह सर्व-देव-मय है।

ब्राह्मतीर्थ, प्राजापत्यतीर्थ अथवा देवतीर्थ से आचमन करे, परंतु पितृतीर्थ से कभी भी आचमन नही करना चाहिये। आचमन का जल ह्रदय तक जाने से ब्राह्मण की; कंठ तक जाने से क्षत्रिय की और वैश्य की जल के प्राशन से तथा शुद्र की जल के स्पर्शमात्र से शुद्धि हो जाती है।

दाहिने हाथ के नीचे और बायें कंधे पर यज्ञोपवीत रहने से द्विज उपविती (सव्य) कहलाता है, इसके विलोम रहने से प्राचीनावीती (अपसव्य) तथा गले में माला की तरह यज्ञोपवीत रहने से निवीती कहा जाता है।

मेखला, मृगछाला, दण्ड, यज्ञोपवीत और कमण्डलु – इनमे कोई भी चीज भग्न हो जाय तो उसे जल में विसर्जित कर मंत्रोच्चारण-पूर्वक दूसरा धारण करना चाहिये। उपवीती (सव्य) होकर और दाहिने हाथ को जानू अर्थात घुटने के भीतर रखकर जो ब्राह्मण आचमन करता है वह पवित्र हो जाता है। ब्राह्मण के हाथ की रेखाओं को गङ्गा आदि नदियों के समान पवित्र समझना चाहिये और अङ्गुलियों के जो पर्व है, वे हिमालय आदि देवपर्वत माने जाते है। इसलिए ब्राह्मण का दाहिना हाथ सर्व-देव-मय है और इस विधि से आचमन करने वाला अंत में स्वर्गलोक को प्राप्त करता है।

(यास्त्वेताः करमध्ये तु रेखा विप्रस्य भारत ॥ गङ्गाद्याः सरितः सर्वा ज्ञेया भरतसत्तम । यान्यङ्गुलिषु पर्वाणि गिरयस्तानि विद्धि वै ॥ सर्वदेवमयो राजन् करो विप्रस्य दक्षिणः ।” (ब्राह्मपर्व ३।९२-९४))

भविष्यपुराण ब्राह्म पर्व अध्याय १ सम्पूर्ण ।

आगे पढ़ें- भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय ४