श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १२

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १२          

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १२"ध्रुव जी को कुबेर का वरदान और विष्णुलोक की प्राप्ति"

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १२

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: द्वादश अध्यायः

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १२ 

श्रीमद्भागवतपुराणम् स्कन्धः ४ अध्यायः १२    

श्रीमद्भागवत महापुराण चौथा स्कन्ध बारहवाँ अध्याय

चतुर्थ स्कन्ध:  श्रीमद्भागवत महापुराण    

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय १२ श्लोक का हिन्दी अनुवाद सहित

मैत्रेय उवाच -

ध्रुवं निवृत्तं प्रतिबुद्ध्य वैशसाद्

     अपेतमन्युं भगवान् धनेश्वरः ।

तत्रागतश्चारणयक्षकिन्नरैः

     संस्तूयमानो न्यवदत् कृताञ्जलिम् ॥ १ ॥

धनद उवाच -

(अनुष्टुप्)

भो भोः क्षत्रियदायाद परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ ।

यत्त्वं पितामहादेशाद् वैरं दुस्त्यजमत्यजः ॥ २ ॥

न भवान् अवधीद्यक्षान् न यक्षा भ्रातरं तव ।

काल एव हि भूतानां प्रभुरप्ययभावयोः ॥ ३ ॥

अहं त्वमित्यपार्था धीः अज्ञानात् पुरुषस्य हि ।

स्वाप्नीवाभात्यतद्ध्यानाद् यया बन्धविपर्ययौ ॥ ४ ॥

तद्‍गच्छ ध्रुव भद्रं ते भगवन्तं अधोक्षजम् ।

सर्वभूतात्मभावेन सर्वभूतात्मविग्रहम् ॥ ५ ॥

भजस्व भजनीयाङ्‌घ्रिं अभवाय भवच्छिदम् ।

युक्तं विरहितं शक्त्या गुणमय्यात्ममायया ॥ ॥ ६ ॥

वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं

     मत्तस्त्वमौत्तानपदेऽविशङ्‌कितः ।

वरं वरार्होऽम्बुजनाभपादयोः

     अनन्तरं त्वां वयमङ्‌ग शुश्रुम ॥ ७ ॥

मैत्रेय उवाच -

स राजराजेन वराय चोदितो

     ध्रुवो महाभागवतो महामतिः ।

हरौ स वव्रेऽचलितां स्मृतिं यया

     तरत्ययत्‍नेन दुरत्ययं तमः ॥ ८ ॥

(अनुष्टुप्)

तस्य प्रीतेन मनसा तां दत्त्वैडविडस्ततः ।

पश्यतोऽन्तर्दधे सोऽपि स्वपुरं प्रत्यपद्यत ॥ ९ ॥

अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।

द्रव्यक्रियादेवतानां कर्म कर्मफलप्रदम् ॥ १० ॥

सर्वात्मनि अच्युतेऽसर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन् ।

ददर्शात्मनि भूतेषु तं एव अवस्थितं विभुम् ॥ ११ ॥

तमेवं शीलसम्पन्नं ब्रह्मण्यं दीनवत्सलम् ।

गोप्तारं धर्मसेतूनां मेनिरे पितरं प्रजाः ॥ १२ ॥

षट्‌त्रिंशद् वर्षसाहस्रं शशास क्षितिमण्डलम् ।

भोगैः पुण्यक्षयं कुर्वन् अभोगैः अशुभक्षयम् ॥ १३ ॥

एवं बहुसवं कालं महात्माविचलेन्द्रियः ।

त्रिवर्गौपयिकं नीत्वा पुत्रायादान् नृपासनम् ॥ १४ ॥

मन्यमान इदं विश्वं मायारचितमात्मनि ।

अविद्यारचितस्वप्न गन्धर्वनगरोपमम् ॥ १५ ॥

आत्मस्त्र्यपत्यसुहृदो बलमृद्धकोशम्

     अन्तःपुरं परिविहारभुवश्च रम्याः ।

भूमण्डलं जलधिमेखलमाकलय्य

     कालोपसृष्टमिति स प्रययौ विशालाम् ॥ १६ ॥

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- विदुर जी! ध्रुव का क्रोध शान्त हो गया है और वे यक्षों के वध से निवृत्त हो गये हैं, यह जानकर भगवान् कुबेर वहाँ आये। उस समय यक्ष, चारण और किन्नर लोग उनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखते ही ध्रुव जी हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब कुबेर ने कहा।

श्रीकुबेर जी बोले ;- शुद्धहृदय क्षत्रियकुमार! तुमने अपने दादा के उपदेश से ऐसा दुस्त्यज वैर त्याग कर दिया; इससे मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। वास्तव में न तुमने यक्षों को मारा है और न यक्षों ने तुम्हारे भाई को। समस्त जीवों की उत्पत्ति और विनाश का कारण तो एकमात्र काल ही है। यह मैं-तू आदि मिथ्या बुद्धि तो जीव को अज्ञानवश स्वप्न के समान शरीरादि को ही आत्मा मानने से उत्पन्न होती है। इसी से मनुष्य को बन्धन एवं दुःखादि विपरीत अवस्थाओं की प्राप्ति होती है।

ध्रुव! अब तुम जाओ, भगवान् तुम्हारा मंगल करें। तुम संसारपास से मुक्त होने के लिये सब जीवों में समदृष्टि रखकर सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीहरि का भजन करो। वे संसारपाश का छेदन करने वाले हैं तथा संसार की उत्पत्ति आदि के लिये अपनी त्रिगुणात्मिक मायाशक्ति से युक्त होकर भी वास्तव में उससे रहित हैं। उनके चरणकमल ही सबके लिये भजन करने योग्य हैं। प्रियवर! हमने सुना है, तुम सर्वदा भगवान् कमलनाभ के चरणकमलों के समीप रहने वाले हो; इसलिये तुम अवश्य ही वर पाने योग्य हो। ध्रुव! तुम्हें जिस वर की इच्छा हो, मुझसे निःसंकोच एवं निःशंक होकर माँग लो।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- विदुर जी! यक्षराज कुबेर ने जब इस प्रकार वर माँगने के लिये आग्रह किया, तब महाभागवत महामति ध्रुव जी ने उनसे यही माँगा कि मुझे श्रीहरि की अखण्ड स्मृति बनी रहे, जिससे मनुष्य सहज ही दुस्तर संसार सागर को पार कर जाता है। इडविडा के पुत्र कुबेर जी ने बड़े प्रसन्न मन से उन्हें भगवत्स्मृति प्रदान की। फिर उनके देखते-ही-देखते वे अन्तर्धान हो गये। इसके पश्चात् ध्रुव जी भी अपनी राजधानी को लौट आये। वहाँ रहते हुए उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले यज्ञों से भगवान् यज्ञपुरुष की आराधना की; भगवान् ही द्रव्य, क्रिया और देवता-सम्बन्धी समस्त कर्म और उसके फल हैं तथा वे ही कर्मफल के दाता भी हैं। सर्वोपाधिशून्य सर्वात्मा श्रीअच्युत में प्रबल वेगयुक्त भक्तिभाव रखते हुए ध्रुव जी अपने में और समस्त प्राणियों में सर्वव्यापक श्रीहरि को ही विराजमान देखने लगे।

ध्रुव जी बड़े ही शील सम्पन्न, ब्राह्मणभक्त, दीनवत्सल और धर्ममर्यादा के रक्षक थे; उनकी प्रजा उन्हें साक्षात् पिता के समान मानती थी। इस प्रकार तरह-तरह के ऐश्वर्य भोग से पुण्य का और भोगों के त्यागपूर्वक यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान से पाप का क्षय करते हुए उन्होंने छत्तीस हजार वर्ष तक पृथ्वी का शासन किया। जितेन्द्रिय महात्मा ध्रुव ने इसी तरह अर्थ, धर्म और काम के सम्पादन में बहुत-से वर्ष बिताकर अपने पुत्र उत्कल को राजसिंहासन सौंप दिया। इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच को अविद्यारचित स्वप्न और गन्धर्वनगर के समान माया से अपने में ही कल्पित मानकर और यह समझकर कि शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेना, भरापूरा खजाना, जनाने महल, सुरम्य विहार भूमि और समुद्रपर्यन्त भूमण्डल का राज्य- ये सभी काल के गाल में पड़े हुए हैं, वे बदरिकाश्रम को चले गये।

तस्यां विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य

     बद्ध्वाऽऽसनं जितमरुन्मनसाऽऽहृताक्षः ।

स्थूले दधार भगवत्प्रतिरूप एतद्

     ध्यायन् तदव्यवहितो व्यसृजत्समाधौ ॥ १७ ॥

भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्नजस्रम्

     आनन्दबाष्पकलया मुहुरर्द्यमानः ।

विक्लिद्यमानहृदयः पुलकाचिताङ्‌गो

     नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिङ्‌गः ॥ १८ ॥

(अनुष्टुप्)

स ददर्श विमानाग्र्यं नभसोऽवतरद् ध्रुवः ।

विभ्राजयद् दश दिशो राकापतिमिवोदितम् ॥ १९ ॥

तत्रानु देवप्रवरौ चतुर्भुजौ

     श्यामौ किशोरावरुणाम्बुजेक्षणौ ।

स्थिताववष्टभ्य गदां सुवाससौ

     किरीटहाराङ्‌गदचारुकुण्डलौ ॥ २० ॥

विज्ञाय तावुत्तमगायकिङ्‌करौ

     अभ्युत्थितः साध्वसविस्मृतक्रमः ।

ननाम नामानि गृणन्मधुद्विषः

     पार्षत्प्रधानौ इति संहताञ्जलिः ॥ २१ ॥

तं कृष्णपादाभिनिविष्टचेतसं

     बद्धाञ्जलिं प्रश्रयनम्रकन्धरम् ।

सुनन्दनन्दावुपसृत्य सस्मितं

     प्रत्यूचतुः पुष्करनाभसम्मतौ ॥ २२ ॥

सुनन्दनन्दावूचतुः -

(अनुष्टुप्)

भो भो राजन् सुभद्रं ते वाचं नोऽवहितः श्रृणु ।

यः पञ्चवर्षस्तपसा भवान् देवमतीतृपत् ॥ २३ ॥

तस्याखिलजगद्धातुः आवां देवस्य शार्ङ्‌गिणः ।

पार्षदौ इविह सम्प्राप्तौ नेतुं त्वां भगवत्पदम् ॥ २४ ॥

सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया

     यत्सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम् ।

आतिष्ठ तच्चन्द्रदिवाकरादयो

     ग्रहर्क्षताराः परियन्ति दक्षिणम् ॥ २५ ॥

(अनुष्टुप्)

अनास्थितं ते पितृभिः अन्यैरप्यङ्‌ग कर्हिचित् ।

आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ २६ ॥

एतद्विमानप्रवरं उत्तमश्लोकमौलिना ।

उपस्थापितमायुष्मन् अधिरोढुं त्वमर्हसि ॥ २७ ॥

मैत्रेय उवाच -

निशम्य वैकुण्ठनियोज्यमुख्ययोः

     मधुच्युतं वाचमुरुक्रमप्रियः ।

कृताभिषेकः कृतनित्यमङ्‌गलो

     मुनीन् प्रणम्याशिषमभ्यवादयत् ॥ २८ ॥

(अनुष्टुप्)

परीत्याभ्यर्च्य धिष्ण्याग्र्यं पार्षदौ अवभिवन्द्य च ।

इयेष तदधिष्ठातुं बिभ्रद्‌रूपं हिरण्मयम् ॥ २९ ॥

तदोत्तानपदः पुत्रो ददर्शान्तकमागतम् ।

मृत्योर्मूर्ध्नि पदं दत्त्वा आरुरोहाद्‌भुतं गृहम् ॥ ३० ॥

वहाँ उन्होंने पवित्र जल में स्नान कर इन्द्रियों को विशुद्ध (शान्त) किया। फिर स्थिर आसन से बैठकर प्राणायाम द्वारा वायु को वश में किया। तदनन्तर मन के द्वारा इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर मन को भगवान् के स्थूल विराट्स्वरूप में स्थिर कर दिया। उसी विराट्रूप का चिन्तन करते-करते अन्त में ध्याता और ध्येय के भेद से शून्य निर्विकल्प समाधि में लीन हो गये और उस अवस्था में विराट्रूप का भी परित्याग कर दिया। इस प्रकार भगवान् श्रीहरि के प्रति निरन्तर भक्तिभाव का प्रवाह चलते रहने से उनके नेत्रों में बार-बार आनन्दाश्रुओं की बाढ़-सी आ जाती थी। इससे उनका हृदय द्रवीभूत हो गया और शरीर में रोमांच हो आया। फिर देहाभिमान गलित हो जाने से उन्हें ‘मैं ध्रुव हूँ’ इसकी स्मृति भी न रही।

इसी समय ध्रुव जी ने आकाश से एक बड़ा ही सुन्दर विमान उतरते देखा। वह अपने प्रकाश से दसों-दिशाओं को आलोकित कर रहा था; मानो पूर्णिमा का चन्द्र ही उदय हुआ हो। उसमें दो श्रेष्ठ पार्षद गदाओं का सहारा लिये खड़े थे। उनके चार भुजाएँ थीं, सुन्दर श्याम शरीर था, किशोर अवस्था थी और अरुण कमल के समान नेत्र थे। वे सुन्दर वस्त्र, किरीट, हार, भुजबन्ध और अति मनोहर कुण्डल धारण किये हुए थे। उन्हें पुण्यश्लोक श्रीहरि के सेवक जान ध्रुव जी हड़बड़ाहट में पूजा आदि का क्रम भूलकर सहसा खड़े हो गये और ये भगवान् के पार्षदों में प्रधान हैं-ऐसा समझकर उन्होंने श्रीमधुसूदन के नामों का कीर्तन करते हुए उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। ध्रुव जी का मन भगवान् के चरणकमलों में तल्लीन हो गया और वे हाथ जोडकर बड़ी नम्रता से सिर नीचा किये खड़े रह गये। तब श्रीहरि के प्रिय पार्षद सुनन्द और नन्द ने उनके पास जाकर मुसकराते हुए कहा।

सुनन्द और नन्द कहने लगे- राजन्! आपका कल्याण हो, आप सावधान होकर हमारी बात सुनिये। आपने पाँच वर्ष की अवस्था में ही तपस्या करके सर्वेश्वर भगवान् को प्रसन्न कर लिया था। हम उन्हीं निखिल जगन्नियन्ता सारंगपाणि भगवान् विष्णु के सेवक हैं और आपको भगवान् के धाम में ले जाने के लिये यहाँ आये हैं। आपने अपनी भक्ति के प्रभाव से विष्णुलोक का अधिकार प्राप्त किया है, जो औरों के लिये बड़ा दुर्लभ है। परमज्ञानी सप्तर्षि भी वहाँ तक नहीं पहुँच सके, वे नीचे से केवल उसे देखते रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र एवं तारागण भी उसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं। चलिये, आप उसी विष्णुधाम में निवास कीजिये। प्रियवर! आज तक आपके पूर्वज तथा और कोई भी उस पद पर कभी नहीं पहुँच सके। भगवान् विष्णु का वह परमधाम सारे संसार में वन्दनीय है, आप वहाँ चलकर विराजमान हों। आयुष्मन्! यह श्रेष्ठ विमान पुण्यश्लोक शिखामणि श्रीहरि ने आपके लिये ही भेजा है, आप इस पर चढ़ने योग्य हैं।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- भगवान् के प्रमुख पार्षदों के ये अमृतमय वचन सुनकर परम भागवत ध्रुव जी ने स्नान किया, फिर सन्ध्या-वन्दनादि नित्य-कर्म से निवृत्त हो मांगलिक अलंकारादि धारण किये। बदरिकाश्रम में रहने वाले मुनियों को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद उस श्रेष्ठ विमान की पूजा और प्रदक्षिणा की और पार्षदों को प्रणाम कर सुवर्ण के समान कान्तिमान् दिव्यरूप धारण कर उस पर चढ़ने को तैयार हुए।

तदा दुन्दुभयो नेदुः मृदङ्‌गपणवादयः ।

गन्धर्वमुख्याः प्रजगुः पेतुः कुसुमवृष्टयः ॥ ३१ ॥

स च स्वर्लोकमारोक्ष्यन् सुनीतिं जननीं ध्रुवः ।

अन्वस्मरदगं हित्वा दीनां यास्ये त्रिविष्टपम् ॥ ३२ ॥

इति व्यवसितं तस्य व्यवसाय सुरोत्तमौ ।

दर्शयामासतुर्देवीं पुरो यानेन गच्छतीम् ॥ ३३ ॥

तत्र तत्र प्रशंसद्‌भिः पथि वैमानिकैः सुरैः ।

अवकीर्यमाणो ददृशे कुसुमैः क्रमशो ग्रहान् ॥ ३४ ॥

त्रिलोकीं देवयानेन सोऽतिव्रज्य मुनीनपि ।

परस्ताद्यद्ध्रुवगतिः विष्णोः पदमथाभ्यगात् ॥ ३५ ॥

यद्‌भ्राजमानं स्वरुचैव सर्वतो

     लोकास्त्रयो ह्यनु विभ्राजन्त एते ।

यन्नाव्रजन्जन्तुषु येऽननुग्रहा

     व्रजन्ति भद्राणि चरन्ति येऽनिशम् ॥ ३६ ॥

(अनुष्टुप्)

शान्ताः समदृशः शुद्धाः सर्वभूतानुरञ्जनाः ।

यान्त्यञ्जसाच्युतपदं अच्युतप्रियबान्धवाः ॥ ३७ ॥

इत्युत्तानपदः पुत्रो ध्रुवः कृष्णपरायणः ।

अभूत्त्रयाणां लोकानां चूडामणिरिवामलः ॥ ३८ ॥

गम्भीरवेगोऽनिमिषं ज्योतिषां चक्रमाहितम् ।

यस्मिन् भ्रमति कौरव्य मेढ्यामिव गवां गणः ॥ ३९ ॥

महिमानं विलोक्यास्य नारदो भगवान् ऋषिः ।

आतोद्यं वितुदन् श्लोकान् सत्रेऽगायत् प्रचेतसाम् ॥ ४० ॥

नारद उवाच -

नूनं सुनीतेः पतिदेवतायाः

     तपःप्रभावस्य सुतस्य तां गतिम् ।

दृष्ट्वाभ्युपायानपि वेदवादिनो

     नैवाधिगन्तुं प्रभवन्ति किं नृपाः ॥ ४१ ॥

यः पञ्चवर्षो गुरुदारवाक्शरैः

     भिन्नेन यातो हृदयेन दूयता ।

वनं मदादेशकरोऽजितं प्रभुं

     जिगाय तद्‌भक्तगुणैः पराजितम् ॥ ४२ ॥

यः क्षत्रबन्धुर्भुवि तस्याधिरूढं

     अन्वारुरुक्षेदपि वर्षपूगैः ।

षट्पञ्चवर्षो यदहोभिरल्पैः

     प्रसाद्य वैकुण्ठमवाप तत्पदम् ॥ ४३ ॥

मैत्रेय उवाच -

(अनुष्टुप्)

एतत्तेऽभिहितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया ।

ध्रुवस्योद्दामयशसः चरितं सम्मतं सताम् ॥ ४४ ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वस्त्ययनं महत् ।

स्वर्ग्यं ध्रौव्यं सौमनस्यं प्रशस्यमघमर्षणम् ॥ ४५ ॥

श्रुत्वैतत् श्रद्धयाभीक्ष्णं अच्युतप्रियचेष्टितम् ।

भवेद्‌भक्तिर्भगवति यया स्यात् क्लेशसङ्‌क्षयः ॥ ४६ ॥

महत्त्वमिच्छतां तीर्थं श्रोतुः शीलादयो गुणाः ।

यत्र तेजस्तदिच्छूनां मानो यत्र मनस्विनाम् ॥ ४७ ॥

प्रयतः कीर्तयेत्प्रातः समवाये द्विजन्मनाम् ।

सायं च पुण्यश्लोकस्य ध्रुवस्य चरितं महत् ॥ ४८ ॥

पौर्णमास्यां सिनीवाल्यां द्वादश्यां श्रवणेऽथवा ।

दिनक्षये व्यतीपाते सङ्‌क्रमेऽर्कदिनेऽपि वा ॥ ४९ ॥

श्रावयेत् श्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः ।

नेच्छन् तत्रात्मनात्मानं सन्तुष्ट इति सिध्यति ॥ ५० ॥

ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेऽमृतम् ।

कृपालोर्दीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्णते ॥ ५१ ॥

इदं मया तेऽभिहितं कुरूद्वह

     ध्रुवस्य विख्यातविशुद्धकर्मणः ।

हित्वार्भकः क्रीडनकानि मातुः

     गृहं च विष्णुं शरणं यो जगाम ॥ ५२ ॥

इतने में ही ध्रुव जी ने देखा कि काल मूर्तिमान् होकर उनके सामने खड़ा है। तब वे मृत्यु के सिर पर पैर रखकर उस समय अद्भुत विमान पर चढ़ गये। उस समय आकाश में दुन्दुभि, मृदंग और ढोल आदि बाजे बजने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्व गान करने लगे और फूलों की वर्षा होने लगी। विमान पर बैठकर ध्रुव जी ज्यों-ही भगवान् के धाम को जाने के लिये तैयार हुए, त्यों-ही उन्हें माता सुनीति का स्मरण हो आया। वे सोचने लगे, ‘क्या मैं बेचारी माता को छोड़कर अकेला ही दुर्लभ वैकुण्ठधाम को जाऊँगा? नन्द और सुनन्द ने ध्रुव के हृदय की बात जानकर उन्हें दिखलाया कि देवी सुनीति आगे-आगे दूसरे विमान पर जा रही हैं। उन्होंने क्रमशः सूर्य आदि सभी ग्रह देखे। मार्ग में जहाँ-तहाँ विमानों पर बैठे हुए देवता उनकी प्रशंसा करते हुए फूलों की वर्षा करते जाते थे।

उस दिव्य विमान पर बैठकर ध्रुव जी त्रिलोकी को पारकर सप्तर्षिमण्डल से भी ऊपर भगवान् विष्णु के नित्यधाम में पहुँचे। इस प्रकार उन्होंने अविचल गति प्राप्त की। यह दिव्य धाम अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है, इसी के प्रकाश से तीनों लोक प्रकाशित हैं। इसमें जीवों पर निर्दयता करने वाले पुरुष नहीं जा सकते। यहाँ तो उन्हीं की पहुँच होती है, जो दिन-रात प्राणियों के कल्याण के लिये शुभ कर्म ही करते रहते हैं। जो शान्त, समदर्शी, शुद्ध और सब प्राणियों को प्रसन्न रखने वाले हैं तथा भगवद्भक्तों को ही अपना एकमात्र सच्चा सुहृद मानते हैं- ऐसे लोग सुगमता से ही इस भगवद्धाम को पाप्त कर लेते हैं। इस प्रकार उत्तानपाद के पुत्र भगवत्परायण श्रीध्रुव जी तीनों लोकों के ऊपर उसकी निर्मल चूड़ामणि के समान विराजमान हुए।

कुरुनन्दन! जिस प्रकार दायँ चलाने के समय खम्भे के चारों ओर बैल घूमते हैं, उसी प्रकार यह गम्भीर वेग वाला ज्योतिश्चक्र उस अविनाशी लोक के आश्रय ही निरन्तर घूमता रहता है। उसकी महिमा देखकर देवर्षि नारद ने प्रचेताओं की यज्ञशाला में वीणा बजाकर ये तीन श्लोक गाये थे।

नारद जी ने कहा ;- इसमें सन्देह नहीं, पतिपरायणा सुनीति के पुत्र ध्रुव ने तपस्या द्वारा अद्भुत शक्ति संचित करके जो गति पायी है, उसे भागवतधर्मों की आलोचना करके वेदवाणी मुनिगण भी नहीं पा सकते; फिर राजाओं की तो बात ही क्या है। अहो! वे पाँच वर्ष की अवस्थाओं में ही सौतेली माता के वाग्बाणों से मर्माहत होकर दुःखी हृदय से वन में चले गये और मेरे उपदेश के अनुसार आचरण करके ही उन अजेय प्रभु को जीत लिया, जो केवल अपने भक्तों के गुणों से ही वश में होते हैं। ध्रुव जी ने तो पाँच-छः वर्ष की अवस्था में कुछ दिनों की तपस्या से ही भगवान् को प्रसन्न करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया; किन्तु उनके अधिकृत किये हुए इस पद को भूमण्डल में कोई दूसरा क्षत्रिय क्या वर्षो तक तपस्या करके भी पा सकता है?

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- विदुर जी! तुमने मुझसे उदारकीर्ति ध्रुव जी के चरित्र के विषय में पूछा था, सो मैंने तुम्हें वह पूरा-का-पूरा सुना दिया। साधुजन इस चरित्र की बड़ी प्रशंसा करते हैं। यह धन, यश और आयु की वृद्धि करने वाला, परम पवित्र और अत्यत्न मंगलमय है। इससे स्वर्ग और अविनाशी पद भी प्राप्त हो सकता है। यह देवत्व की प्राप्ति कराने वाला, बड़ा ही प्रशंसनीय और समत पापों का नाश करने वाला है। भगवद्भक्त ध्रुव के इस पवित्र चरित्र को जो श्रद्धापूर्वक बार-बार सुनते हैं, उन्हें भगवान् की भक्ति प्राप्त होती है, जिससे उनके सभी दुःखों का नाश हो जाता है। इसे श्रवण करने वाले को शीलादि गुणों की प्राप्ति होती है, जो महत्त्व चाहते हैं, उन्हें महत्त्व की प्राप्ति कराने वाला स्थान मिलता है, जो तेज चाहते हैं, उन्हें तेज प्राप्त होता है और मनस्वियों का मान बढ़ता है।

पवित्रकीर्ति ध्रुव जी के इस महान् चरित्र का प्रातः और सायंकाल ब्रह्माणादि द्विजातियों के समान में एकाग्रचित्त से कीर्तन करना चाहिये। भगवान् के परम पवित्र चरणों की शरण में रहने वाला जो पुरुष इसे निष्कामभाव से पूर्णिमा, अमावस्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथिक्षय, व्यतीपात, संक्रान्ति अथवा रविवार के दिन श्रद्धालु पुरुषों को सुनाता है, वह स्वयं अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट रहने लगता है और सिद्ध हो जाता है। यह साक्षात् भगवद्विषयक अमृतमय ज्ञान है; जो लोग भगवन्मार्ग के मर्म से अनभिज्ञ हैं- उन्हें जो कोई इसे प्रदान करता है, उस दीनवत्सल कृपालु पुरुष पर देवता अनुग्रह करते हैं। ध्रुव जी के कर्म सर्वत्र प्रसिद्ध और परम पवित्र हैं; वे अपनी बाल्यावस्था में ही माता के घर और खिलौनों का मोह छोड़कर श्रीविष्णु भगवान् की शरण में चले गये थे। कुरुनन्दन! उनका यह पवित्र चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया।

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे ध्रुवचरित नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

इस प्रकार श्रीमद्‌भागवत महापुराण का परमहंस संहिता स्कन्ध ४ अध्याय १२ समाप्त हुआ ॥ १२ ॥

आगे जारी-पढ़े............... स्कन्ध ४ अध्याय १३  

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय ११

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय ११         

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय ११ "स्वायम्भुव-मनु का ध्रुव जी को युद्ध बंद करने के लिये समझाना"

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय ११
श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय ११

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: एकादश अध्यायः

श्रीमद्भागवतपुराणम् स्कन्धः ४ अध्यायः ११   

श्रीमद्भागवत महापुराण चौथा स्कन्ध ग्यारहवाँ अध्याय

चतुर्थ स्कन्ध:  श्रीमद्भागवत महापुराण    

श्रीमद्भागवत महापुराण स्कन्ध ४ अध्याय ११ श्लोक का हिन्दी अनुवाद सहित

मैत्रेय उवाच -

(अनुष्टुप्)

निशम्य गदतामेवं ऋषीणां धनुषि ध्रुवः ।

सन्दधेऽस्त्रमुपस्पृश्य यन्नारायणनिर्मितम् ॥ १ ॥

सन्धीयमान एतस्मिन् माया गुह्यकनिर्मिताः ।

क्षिप्रं विनेशुर्विदुर क्लेशा ज्ञानोदये यथा ॥ २ ॥

तस्यार्षास्त्रं धनुषि प्रयुञ्जतः

     सुवर्णपुङ्‌खाः कलहंसवाससः ।

विनिःसृता आविविशुर्द्विषद्‍बलं

     यथा वनं भीमरवाः शिखण्डिनः ॥ ३ ॥

तैस्तिग्मधारैः प्रधने शिलीमुखैः

     इतस्ततः पुण्यजना उपद्रुताः ।

तमभ्यधावन् कुपिता उदायुधाः

     सुपर्णं उन्नद्धफणा इवाहयः ॥ ४ ॥

स तान् पृषत्कैरभिधावतो मृधे

     निकृत्तबाहूरुशिरोधरोदरान् ।

निनाय लोकं परमर्कमण्डलं

     व्रजन्ति निर्भिद्य यमूर्ध्वरेतसः ॥ ५ ॥

तान् हन्यमानानभिवीक्ष्य गुह्यकान्

     अनागसश्चित्ररथेन भूरिशः ।

औत्तानपादिं कृपया पितामहो

     मनुर्जगादोपगतः सहर्षिभिः ॥ ६ ॥

मनुरुवाच -

(अनुष्टुप्)

अलं वत्सातिरोषेण तमोद्वारेण पाप्मना ।

येन पुण्यजनानेतान् अवधीस्त्वं अनागसः ॥ ७ ॥

नास्मत्कुलोचितं तात कर्मैतत् सद्विगर्हितम् ।

वधो यदुपदेवानां आरब्धस्तेऽकृतैनसाम् ॥ ८ ॥

नन्वेकस्यापराधेन प्रसङ्‌गाद् बहवो हताः ।

भ्रातुर्वधाभितप्तेन त्वयाङ्‌ग भ्रातृवत्सल ॥ ९ ॥

नायं मार्गो हि साधूनां हृषीकेशानुवर्तिनाम् ।

यदात्मानं पराग्गृह्य पशुवद्‌भूतवैशसम् ॥ १० ॥

सर्वभूतात्मभावेन भूतावासं हरिं भवान् ।

आराध्याप दुराराध्यं विष्णोस्तत्परमं पदम् ॥ ११ ॥

स त्वं हरेरनुध्यातः तत्पुंसामपि सम्मतः ।

कथं त्ववद्यं कृतवान् अनुशिक्षन्सतां व्रतम् ॥ १२ ॥

तितिक्षया करुणया मैत्र्या चाखिलजन्तुषु ।

समत्वेन च सर्वात्मा भगवान् सम्प्रसीदति ॥ १३ ॥

सम्प्रसन्ने भगवति पुरुषः प्राकृतैर्गुणैः ।

विमुक्तो जीवनिर्मुक्तो ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥ १४ ॥

भूतैः पञ्चभिरारब्धैः योषित्पुरुष एव हि ।

तयोर्व्यवायात् सम्भूतिः योषित्पुरुषयोरिह ॥ १५ ॥

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं ;- विदुर जी! ऋषियों का ऐसा कथन सुनकर महाराज ध्रुव ने आचमन कर श्रीनारायण के बनाये हुए नारायणास्त्र को अपने धनुष पर चढ़ाया। उस बाण के चढ़ाते ही यक्षों द्वारा रची हुई नाना प्रकार की माया उसी क्षण नष्ट हो गयी, जिस प्रकार ज्ञान का उदय होने पर अविद्यादि क्लेश नष्ट हो जाते हैं।

ऋषिवर नारायण के द्वारा आविष्कृत उस अस्त्र को धनुष पर चढ़ाते ही उससे राजहंस के-से पक्ष और सोने के फल वाले बड़े तीखे बाण निकले और जिस प्रकार मयूर केकारव करते वन में घुस जाते हैं, उसी प्रकार भयानक सांय-सांय शब्द करते हुए वे शत्रु की सेना में घुस गये। उन तीखी धार वाले बाणों ने शत्रुओं को बेचैन कर दिया। तब उस रणांगण में अनेकों यक्षों ने अत्यन्त कुपित होकार अपने अस्त्र-शस्त्र सँभाले और जिस प्रकार गरुड़ के छेड़ने से बड़े-बड़े सर्प फन उठाकर उनकी ओर दौड़ते हैं, उसी प्रकार वे इधर-उधर से ध्रुव जी पर टूट पड़े। उन्हें सामने आते देख ध्रुव जी ने अपने बाणों द्वारा उनकी भुजाएँ, जाँघें, कंधे, और उदर आदि अंग-प्रत्यंगों को छिन्न-भिन्न कर उन्हें उस सर्वश्रेष्ठ लोक (सत्यलोक) में भेज दिया, जिसमें उर्ध्वरेता मुनिगण सूर्यमण्डल का भेदन करके जाते हैं। अब उनके पितामह स्वयाम्भुव मनु ने देखा कि विचित्र रथ पर चढ़े हुए ध्रुव अनेकों निरपराध यक्षों को मार रहे हैं, तो उन्हें उन पर बहुत दया आयी। वे बहुत-से ऋषियों को साथ लेकर वहाँ आये और अपने पौत्र ध्रुव को समझाने लगे।

मनु जी ने कहा ;- बेटा! बस, बस! अधिक क्रोध करना ठीक नहीं। यह पापी नरक का द्वार है। इसी के वशीभूत होकर तुमने इन निरपराध यक्षों का वध किया है। तात! तुम तो निर्दोष यक्षों के संहार पर उतर रहे हो, यह हमारे कुल के योग्य कर्म नहीं है; साधु पुरुष इसकी बड़ी निन्दा करते हैं। बेटा! तुम्हारा अपने भाई पर अनुराग था, यह तो ठीक है; परन्तु देखो, उसके वध से सन्तप्त होकर तुमने एक यक्ष के अपराध करने पर प्रसंगवश कितनों की हत्या कर डाली। इस जड़ शरीर को ही आत्मा मानकर इसके लिये पशुओं की भाँति प्राणियों की हिंसा करना यह भगवत्सेवी साधुजनों का मार्ग नहीं है। प्रभु की आराधना करना बड़ा कठिन है, परन्तु तुमने तो लड़कपन में ही सम्पूर्ण भूतों के आश्रय-स्थान श्रीहरि की सर्वभूतात्मा भाव से आराधना करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया है। तुम्हें तो प्रभु भी अपना प्रिय भक्त समझते हैं तथा भक्तजन भी तुम्हारा आदर करते हैं। तुम साधुजनों के पथप्रदर्शक हो; फिर भी तुमने ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे किया?

सर्वात्मा श्रीहरि तो अपने से बड़े पुरुषों के प्रति सहनशीलता, छोटों के प्रति दया, बराबर वालों के साथ मित्रता और समस्त जीवों के साथ समता का बर्ताव करने से ही प्रसन्न होते हैं और प्रभु के प्रसन्न हो जाने पर पुरुष प्राकृत गुण एवं उनके कार्यरूप लिंगशरीर से छूटकर परमानन्दस्वरूप ब्रह्मपद प्राप्त कर लेता है।

बेटा ध्रुव! देहादि के रूप में परिणत हुए पंचभूतों से स्त्री-पुरुष का आविर्भाव होता है और फिर उनके पारम्परिक समागम से दूसरे स्त्री-पुरुष उत्पन्न होते हैं।

एवं प्रवर्तते सर्गः स्थितिः संयम एव च ।

गुणव्यतिकराद् राजन् मायया परमात्मनः ॥ १६ ॥

निमित्तमात्रं तत्रासीत् निर्गुणः पुरुषर्षभः ।

व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत् ॥ १७ ॥

स खल्विदं भगवान्कालशक्त्या

     गुणप्रवाहेण विभक्तवीर्यः ।

करोत्यकर्तैव निहन्त्यहन्ता

     चेष्टा विभूम्नः खलु दुर्विभाव्या ॥ १८ ॥

(अनुष्टुप्)

सोऽनन्तोऽन्तकरः कालो ऽनादिरादिकृदव्ययः ।

जनं जनेन जनयन् मारयन् मृत्युनान्तकम् ॥ १९ ॥

न वै स्वपक्षोऽस्य विपक्ष एव वा

     परस्य मृत्योर्विशतः समं प्रजाः ।

तं धावमानं अनुधावन्त्यनीशा

     यथा रजांस्यनिलं भूतसङ्‌घाः ॥ २० ॥

(अनुष्टुप्)

आयुषोऽपचयं जन्तोः तथैवोपचयं विभुः ।

उभाभ्यां रहितः स्वस्थो दुःस्थस्य विदधात्यसौ ॥ २१ ॥

केचित्कर्म वदन्त्येनं स्वभावमपरे नृप ।

एके कालं परे दैवं पुंसः काममुतापरे ॥ २२ ॥

अव्यक्तस्याप्रमेयस्य नानाशक्त्युदयस्य च ।

न वै चिकीर्षितं तात को वेदाथ स्वसम्भवम् ॥ २३ ॥

न चैते पुत्रक भ्रातुः हन्तारो धनदानुगाः ।

विसर्गादानयोस्तात पुंसो दैवं हि कारणम् ॥ २४ ॥

स एव विश्वं सृजति स एवावति हन्ति च ।

अथापि ह्यनहङ्‌कारात् नाज्यते गुणकर्मभिः ॥ २५ ॥

एष भूतानि भूतात्मा भूतेशो भूतभावनः ।

स्वशक्त्या मायया युक्तः सृजत्यत्ति च पाति च ॥ २६ ॥

तमेव मृत्युममृतं तात दैवं

     सर्वात्मनोपेहि जगत्परायणम् ।

यस्मै बलिं विश्वसृजो हरन्ति

     गावो यथा वै नसि दामयन्त्रिताः ॥ २७ ॥

यः पञ्चवर्षो जननीं त्वं विहाय

     मातुः सपत्‍न्या वचसा भिन्नमर्मा ।

वनं गतस्तपसा प्रत्यगक्षं

     आराध्य लेभे मूर्ध्नि पदं त्रिलोक्याः ॥ २८ ॥

तमेनमङ्‌गात्मनि मुक्तविग्रहे

     व्यपाश्रितं निर्गुणमेकमक्षरम् ।

आत्मानमन्विच्छ विमुक्तमात्मदृग्

     यस्मिन् इदं भेदमसत्प्रतीयते ॥ २९ ॥

त्वं प्रत्यगात्मनि तदा भगवत्यनन्त

     आनन्दमात्र उपपन्नसमस्तशक्तौ ।

भक्तिं विधाय परमां शनकैरविद्या

     ग्रन्थिं विभेत्स्यसि ममाहमिति प्ररूढम् ॥ ३० ॥

(अनुष्टुप्)

संयच्छ रोषं भद्रं ते प्रतीपं श्रेयसां परम् ।

श्रुतेन भूयसा राजन् अगदेन यथामयम् ॥ ३१ ॥

येनोपसृष्टात्पुरुषात् लोक उद्विजते भृशम् ।

न बुधस्तद्वशं गच्छेद् इच्छन् अभयमात्मनः ॥ ३२ ॥

हेलनं गिरिशभ्रातुः धनदस्य त्वया कृतम् ।

यज्जघ्निवान् पुण्यजनान् भ्रातृघ्नानित्यमर्षितः ॥ ३३ ॥

तं प्रसादय वत्साशु सन्नत्या प्रश्रयोक्तिभिः ।

न यावन्महतां तेजः कुलं नोऽभिभविष्यति ॥ ३४ ॥

एवं स्वायम्भुवः पौत्रं अनुशास्य मनुर्ध्रुवम् ।

तेनाभिवन्दितः साकं ऋषिभिः स्वपुरं ययौ ॥ ३५ ॥

ध्रुव! इस प्रकार भगवान् की माया से सत्त्वादि गुणों में न्यूनाधिक भाव होने से ही जैसे भूतों द्वारा शरीरों की रचना होती है, वैसे ही उनकी स्थिति और प्रलय भी होते हैं। पुरुषश्रेष्ठ! निर्गुण परमात्मा तो इनमें केवल निमित्तमात्र है; उसके आश्रय से यह कार्यकरणात्मक जगत् उसी प्रकार भ्रमता रहता है, जैसे चुम्बक के आश्रय से लोहा। काल-शक्ति के द्वारा क्रमशः सत्त्वादि गुणों में क्षोभ होने से लीलामय भगवान् की शक्ति भी सृष्टि आदि के रूप में विभक्त हो जाती है; अतः भगवान् अकर्ता होकर भी जगत् की रचना करते हैं और संहार करने वाले न होकर भी इसका संहार करते हैं। सचमुच उन अनन्त प्रभु की लीला सर्वथा अचिन्तनीय है। ध्रुव! वे कालस्वरूप अव्यय परमात्मा ही स्वयं अन्तरहित होकर भी जगत् का अन्त करने वाले हैं तथा अनादि होकर भी सबके आदिकर्ता हैं। वे ही एक जीव से दूसरे जीव को उत्पन्न कर संसार की सृष्टि करते हैं तथा मृत्यु के द्वारा मारने वाले को भी मरवाकर उसका संहार करते हैं। वे काल भगवान् सम्पूर्ण सृष्टि में समान रूप से अनुप्रविष्ट हैं। उनका न तो कोई मित्र पक्ष है और न शत्रु पक्ष। जैसे वायु के चलने पर धूल उसके साथ-साथ उड़ती है, उसी प्रकार समस्त जीव अपने-अपने कर्मों के अधीन होकर काल की गति का अनुसरण करते हैं-अपने-अपने कर्मानुसार सुख-दुःखादि फल भोगते हैं। सर्वसमर्थ श्रीहरि कर्मबन्धन में बँधे हुए जीव की आयु की वृद्धि और क्षय का विधान करते हैं, परन्तु वे स्वयं इन दोनों से रहित और अपने स्वरूप में स्थित हैं।

राजन्! इन परमात्मा को ही मीमांसक लोग कर्म, चार्वाक, स्वभाव, वैशेषिक मतावलम्बी काल, ज्योतिषी दैव और कामशास्त्री काम कहते हैं। वे किसी भी इन्द्रिय या प्रमाण के विषय नहीं हैं। महदादि अनेक शक्तियाँ भी उन्हीं से प्रकट हुईं हैं। वे क्या करना चाहते हैं, इस बात को भी संसार में कोई नहीं जानता; फिर अपने मूल कारण उन प्रभु को तो जान ही कौन सकता है। बेटा! ये कुबेर के अनुचर तुम्हारे भाई को मारने वाले नहीं हैं, क्योंकि मनुष्य के जन्म-मरण का वास्तविक कारण तो ईश्वर है। एकमात्र वही संसार को रचता, पालता और नष्ट करता है, किन्तु अहंकारशून्य होने के कारण इसके गुण और कर्मों से वह सदा निर्लेप रहता है। वे सम्पूर्ण प्राणियों के अन्तरात्मा, नियन्ता और रक्षा करने वाले प्रभु ही अपनी मायाशक्ति से युक्त होकर समस्त जीवों का सृजन, पालन और संहार करते हैं। जिस प्रकार नाक में नकेल पड़े हुए बैल अपने मालिक का बोझा ढोते रहते हैं, उसी प्रकार जगत् की रचना करने वाले ब्रह्मादि भी नामरूप डोरी से बँधे हुए उन्हीं की आज्ञा का पालन करते हैं। वे अभक्तों के लिये मृत्युरूप और भक्तों के लिये अमृतरूप हैं तथा संसार के एकमात्र आश्रय हैं।

तात! तुम सब प्रकार उन्हीं परमात्मा की शरण लो। तुम पाँच वर्ष की ही अवस्था में अपनी सौतेली माता के वाग्बाणों से मर्माहत होकर माँ की गोद छोड़कर वन को चले गये थे। वहाँ तपस्या द्वारा जिन हृषीकेश भगवान् की आराधना करके तुमने त्रिलोकी से ऊपर ध्रुवपद प्राप्त किया है और जो तुम्हारे वैरभावहीन सरल हृदय में वात्सल्यवश विशेष रूप से विराजमान हुए थे, उन निर्गुण अद्वितीय अविनाशी और नित्यमुक्त परमात्मा को अध्यात्म दृष्टि से अपने अन्तःकरण में ढूँढो। उनमें यह भेदभावमय प्रपंच न होने पर भी प्रतीत हो रहा है। ऐसा करने से सर्वशक्तिसम्पन्न परमानन्दस्वरूप सर्वान्तर्यामी भगवान् अनन्त में तुम्हारी सुदृढ़ भक्ति होगी और उसके प्रभाव से तुम मैं-मेरेपन के रूप में दृढ़ हुई अविद्या की गाँठ को काट डालोगे।

राजन्! जिस प्रकार ओषधि से रोग शान्त किया जाता है-उसी प्रकार मैंने तुम्हें जो कुछ उपदेश दिया है, उस पर विचार करके अपने क्रोध को शान्त करो। क्रोध कल्याण मार्ग का बड़ा ही विरोधी है। भगवान् तुम्हारा मंगल करें। क्रोध के वशीभूत हुए पुरुष से सभी लोगों को बड़ा भय होता है; इसलिये जो बुद्धिमान् पुरुष ऐसा चाहता है कि मुझसे किसी भी प्राणी को भय न हो और मुझे भी किसी से भय न हो, उसे क्रोध के वश में कभी न होना चाहिये। तुमने जो यह समझकर कि ये मेरे भाई के मारने वाले हैं, इतने यक्षों का संहार किया है, इससे तुम्हारे द्वारा भगवान् शंकर के सखा कुबेर जी का बड़ा अपराध हुआ है। इसलिये बेटा! जब तक कि महापुरुषों का तेज हमारे कुल को आक्रान्त नहीं कर लेता; इसके पहले ही विनम्र भाषण और विनय के द्वारा शीघ्र उन्हें प्रसन्न कर लो।

इस प्रकार स्वयाम्भुव मनु ने अपने पौत्र ध्रुव को शिक्षा दी। तब ध्रुव जी ने उन्हें प्रणाम किया। इसके पश्चात् वे महर्षियों के सहित अपने लोक को चले गये।

इति श्रीमद्‌भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीमद्‌भागवत महापुराण का परमहंस संहिता स्कन्ध ४ अध्याय ११ समाप्त हुआ ॥ ११ ॥

आगे जारी-पढ़े............... स्कन्ध ४ अध्याय १२